मनोज कुमार त्रिपाठी
गोरखपुर।
मुख्यमंत्री योगी आदित्यनाथ जी के गृह जनपद गोरखपुर में गौ-सुरक्षा की स्थिति लगातार चिंताजनक होती जा रही है। शहर से लेकर ग्रामीण क्षेत्रों तक बड़ी संख्या में गायों को दूध निकालने के बाद बेसहारा छोड़ दिया जा रहा है, जिसके कारण वे भोजन की तलाश में सड़कों, चौराहों और राष्ट्रीय राजमार्गों पर भटकती नजर आ रही हैं।
इन गायों के लिए भूख सबसे बड़ा संकट बन चुकी है। कई स्थानों पर वे कूड़े के ढेर में प्लास्टिक और गंदगी खाते हुए देखी जा रही हैं, तो कई बार तेज रफ्तार वाहनों की चपेट में आकर दुर्घटनाओं का शिकार हो जाती हैं। इससे न केवल गौवंश की जान खतरे में है, बल्कि आम नागरिकों की सुरक्षा भी प्रभावित हो रही है।
स्थानीय लोगों का कहना है कि गाय पालने वाले लोग दूध लेने के बाद अपनी जिम्मेदारी निभाने से पीछे हट जाते हैं। चारे, पानी और सुरक्षित आश्रय की कोई व्यवस्था नहीं की जाती। गौशालाएं सीमित संसाधनों के कारण दबाव में हैं और सड़कों पर गौवंश की संख्या बढ़ती जा रही है।
यह स्थिति मुख्यमंत्री योगी आदित्यनाथ जी की उस सोच पर भी प्रश्न खड़े करती है, जिसमें गौ-सेवा और गौ-संरक्षण को सर्वोच्च प्राथमिकता दी गई है। गोरखपुर की जनता अपेक्षा करती है कि—गायों को छोड़ने वाले गौ-पालकों की पहचान कर सख्त कार्रवाई की जाए , प्रत्येक गौ-पालक की जवाबदेही तय हो, नगर निगम और पंचायत स्तर पर निगरानी व्यवस्था मजबूत की जाए , गौ-आश्रय स्थलों में चारा, पानी और चिकित्सा की स्थायी व्यवस्था सुनिश्चित की जाए गाय केवल धार्मिक आस्था का विषय नहीं, बल्कि संवेदनशीलता, संस्कृति और सामाजिक जिम्मेदारी का प्रतीक है। यदि गोरखपुर में ही गौवंश सुरक्षित नहीं है, तो प्रदेश के अन्य जिलों की स्थिति पर भी गंभीरता से विचार करने की आवश्यकता है।
अब समय आ गया है कि गौ-सेवा को केवल दूध तक सीमित न रखकर, जीवनभर की जिम्मेदारी के रूप में लागू किया जाए।





