मधेश के हाथ में हो सकती है नेपाल की सत्ता की चाभी!! 

मधेश फतह किए विना किसी भी पार्टी के लिए सत्ता की कुर्सी आसान नहीं 

युवा बदल सकते हैं चुनाव नतीजों की तस्वीर

नेपाल की सत्ता में राष्ट्रीय प्रजातंत्र पार्टी की भी होगी अहम भूमिका 

राप्रपा के राजेंद्र लिंगदेन भी प्रधानमंत्री पद के दावेदार 

उमेश चन्द्र त्रिपाठी 

काठमांडू! नेपाल का चुनाव कई मायनों में बड़ा दिलचस्प है। नई और पुरानी सभी पार्टियां बस भाग्य भरोसे चुनाव मैदान में हैं। एजेंडे की बात करें तो सभी के पास वही पुराना राग ही है। नेपाली कांग्रेस जो इस बार पूर्व महामंत्री गगन थापा के नेतृत्व में अपने पुराने दावे और वादों के साथ मैदान में हैं। पार्टी के नए सभापति गगन थापा ने तो पूर्व सभापति शेर बहादुर देउबा को टिकट से ही वंचित कर दिया। एमाले और माओवादी केंद्र के पास भी नेपाल के लिए कुछ नया नहीं है। इन तीन पुरानी पार्टियों के इतर इस बार पूरे नेपाल में चुनाव मैदान में उत्तरी राष्ट्रीय स्वतंत्र पार्टी को लोग भरोसे की दृष्टि से जरूर देख रहे हैं।

नेपाल के पहाड़ों में लोगों को इस पार्टी से परिवर्तन की अनुभूति की आश है, लेकिन इसका भी कोई क्लियर एजेंडा नहीं दिख रहा, हां इस पार्टी में जेन जी आंदोलन के नायक सुडान गुरूंग और काठमांडू के पूर्व मेयर बालेन शाह सहित ढेर सारे युवाओं के आ जाने से इस पार्टी को युवा मतदाताओं पर भरोसा ज्यादा है। नेपाल में सत्ता आती जाती रही है, लेकिन समस्याएं जस की तस हैं। 

बेरोजगारी, पलायन, मंहगाई, भ्रष्टाचार सब बेकाबू है। इस सबसे युवा ही ज्यादा प्रभावित और आक्रोशित हैं। जैसा कि दिख रहा है, यदि युवाओं का फैसला एक तरफा हुआ तो संभव है, परिणाम चौंकाने वाला हो, लेकिन यह भी संभव है कि सत्ता की चाभी मधेश के हाथ में हो। राजेंद्र लिंगदेन के नेतृत्व में राष्ट्रीय प्रजातंत्र पार्टी भी इस चुनाव में बड़े ही दमखम के साथ चुनाव लड़ रही है। राजेंद्र लिंगदेन स्वत: प्रधानमंत्री पद के दावेदार हैं। राजावादी समर्थक बड़े ही मजबूती से राप्रपा के साथ राप्रपा के साथ खड़े दिखाई दे रहे हैं। 

राष्ट्रीय स्वतंत्र पार्टी का जन्म पिछले चुनाव में धूमकेतु की तरह हुआ। इसके अध्यक्ष रवि लामिछाने नेपाल के पत्रकार रहे हैं। इनका टीवी टाक शो नेपाल में काफी लोकप्रिय रहा है। पिछले चुनाव में पश्चिम नेपाल में इस पार्टी को अच्छी खासी सफलता मिली थी। एक दर्जन से के सुलझ जाने पर वे प्रतिनिधि सभा में वापस आए और फिर गृहमंत्री बने। 

गृहमंत्री रहते हुए उन्होंने ब्यूरोक्रेट्स और राजनीतिक भ्रष्टाचार पर अंकुश लगाने की भरपूर कोशिश की। कई बड़े अफसरों और राजनेताओं के भ्रष्टाचार की जांच का आदेश देकर वे सुर्खियों में रहे, हालांकि उन्हें इसका खामियाजा भुगतना पड़ा।

प्रचंड और ओली के अलग होने के बाद जब नेपाली कांग्रेस और ओली की सरकार बनी तो इस सरकार में रवि लामिछाने शामिल नहीं हुए। इस बीच वे खुद धोखाधड़ी के बड़े लपेटे में आ गए। उन्हें जेल जाना पड़ा। अभी वे जमानत पर है। राष्ट्रीय स्वतंत्र पार्टी पूरी तरह रवि लामिछाने के नेतृत्व और जेन-जी आंदोलन के नायकों के भरोसे है। बालेन शाह जब काठमांडू के मेयर थे, तब अपने कार्यालय ग्रेटर नेपाल का नक्शा लगाए हुए थे, वे कभी-कभी हिंदुत्व की भी बात करते हैं। ग्रेटर नेपाल के नक्शे में भारत के सीमावर्ती हिस्से को भी दर्शाया गया है। यदि उनकी राजनीति का केंद्र बिंदु यही है, तो समझा जा सकता है कि सत्ता में आने पर इस पार्टी का भारत से कैसा रिश्ता हो सकता है। 

यह चुनाव सोशल मीडिया प्लेटफॉर्म ‘हामी नेपाल’ के संचालक सुडान गुरुंग और बालेन शाह की अग्निपरीक्षा है। बालेन शाह राष्ट्रीय स्वतंत्र पार्टी से पूर्व पीएम केपी शर्मा ओली के खिलाफ झापा क्षेत्र संख्या पांच से चुनाव लड़ रहे हैं। वहीं सुडान गुरूंग कुछ बड़ा करने के लिए गोरखा क्षेत्र संख्या एक से चुनाव लड़ रहे हैं। गोरखा क्षेत्र संख्या एक की बात करें, तो यहां का चुनाव किसी के लिए भी आसान नहीं है। सुडान केपी शर्मा ओली के अपदस्थ होने के बाद अंतरिम सरकार के किंगमेकर की भूमिका में थे। पिछले कई चुनावी होते सत्ता समीकरण में ‘किंगमेकर’ की भूमिका तक पहुंच गए। 

सुशीला कार्की के नेतृत्व में बनी अंतरिम सरकार और मंत्रियों की नियुक्ति में उनकी प्रत्यक्ष भूमिका रही। जिस तेजी से वे राष्ट्रीय राजनीति में उभरे, उसी तेजी से आगे बढ़ पाएं, तो नेपाल की राजनीति में यह एक परिवर्तन होगा, जो नेपाल के मिजाज को रेखांकित करेगा।

झापा क्षेत्र संख्या पांच से काठमांडू के पूर्व मेयर बालेन शाह केपी शर्मा ओली के मुकाबले चुनाव लड़ रहे हैं। वे राष्ट्रीय स्वतंत्र पार्टी की ओर से प्रधानमंत्री पद का चेहरा हैं। पिछले दिनों नेपाल के एक बड़े गुटखा व्यवसायी द्वारा गिफ्ट की गई मंहगी डिफेंडर गाड़ी को लेकर वे सुर्खियों में थे। अब उनके खिलाफ चुनाव आयोग में औपचारिक रूप से शिकायत दर्ज की गई है। 

बालेन शाह पर चुनावी आचार संहिता, प्रचलित कानूनों और लोकतांत्रिक मूल्यों के उल्लंघन का आरोप लगाया गया है।

नेपाल के चुनाव में इस बार ‘मधेश’ मुद्दा गायब है, लेकिन यह भी सच है कि मधेश फतह किए बिना किसी भी पार्टी के लिए सत्ता की कुर्सी आसान नहीं है। 

राष्ट्रीय स्वतंत्र पार्टी ने इसी के दृष्टिगत मधेश में अपेक्षाकृत अच्छे और योग्य उम्मीदवारों का चयन कर मैदान में उतारा है। अब वे कितना कामयाब हो पाएंगे, यह आकलन अभी मुश्किल है। 

नेपाल के मेची से महाकाली तक मधेश क्षेत्र का 23 जिला भारतीय सीमा से सटा है। यहां की करीब 90 लाख की आबादी नेपाली भाषा के साथ हिंदी भाषी भी हैं। ये लोग खुद को भारत के करीब महसूस करते हैं। पूर्व में यहां के संसदीय क्षेत्रों का सीमांकन पूरब पश्चिम को था। तब मधेश से मधेशी उम्मीदवार ही चुनाव जीतते थे, वे चाहे जिस दल के हों।

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