नेपाल में चला बालेन शाह का जादू, सरकार बनाने के बेहद करीब

पुराने सभी राजनीतिक दल धराशाई, विपक्ष में बैठने लायक भी सीटें जीतने के लायक नहीं 

सरकार बनाने के लिए 275 सीटों में 138 की दरकार 

उमेश चन्द्र त्रिपाठी 

काठमांडू! नेपाल में चुनाव बाद वोटों की गिनती का जो रूझान आ रहा है उससे तय है कि पुरानी कोई भी पार्टी बहुमत तो दूर, विपक्ष के लायक भी सीटें जीतने की स्थिति में नहीं दिख रही। मतदान संपन्न होने के बाद उसी दिन रात 12 बजे से वोटों की गिनती शुरू हो गई। शुक्रवार को देर शाम तक की मतगणना में नेपाल के एक से एक धुरंधर विश्लेषकों के अनुमान को धता बताते हुए राष्ट्रीय स्वतंत्र पार्टी शानदार बढ़त के साथ काफी आगे है। उसे प्रतिनिधि सभा के 165 सीटों में से करीब 75 सीटों पर बढ़त मिल रही है। देर शाम तक उसके पक्ष में कुछ सीटों की घोषणा भी हुई है। काठमांडू वैली की सभी सीटों के बढ़त के आंकड़े पर गौर करें तो यहां सभी पार्टियों का सूपड़ा साफ नजर आता है। सभी सीटें राष्ट्रीय स्वतंत्र पार्टी के खाते में आ सकती है।

नेपाली कांग्रेस और एमाले ने अपनी ऐसी दुर्गति शायद सोची भी नहीं होगी। अभी तक के रूझान में ये दोनों दस सीटों पर भी जीत दर्ज करते हुए नजर नहीं आ रहे। प्रचंड गुट के माओवादी केंद्र का हाल भी बहुत बुरा है। अलबत्ता प्रचंड अपनी सीट बचाने में कामयाब दिख रहे हैं। सरकार गठन के लिए कुल 275 सीटों में से 138 सीटों की दरकार है। इसके लिए अप्रत्यक्ष वोटों के चुनाव नतीजों का इंतजार है। 

 

 

बता दें कि कुछ महीने पहले नेपाल में हुए जेन जी आंदोलन के बाद सत्ता रूढ़ एमाले गठबंधन सरकार को अपदस्थ कर दिया गया था। इसके बाद अंतरिम सरकार का गठन हुआ जिसकी प्रधानमंत्री उच्च न्यायालय की पूर्व न्यायाधीश सुशीला कार्की बनी थीं जो अपने छोटे मंत्रिमंडल के साथ सरकार चला रही थीं। उन्होंने 6 महीने के भीतर चुनाव कराकर सत्ता चुनी हुई सरकार को सौंप देने का वादा किया था।

जेन जी आंदोलन के समय ही काठमांडू के पूर्व मेयर बालेन शाह अंतरिम सरकार का चेहरा बनकर उभरे थे लेकिन किन्हीं कारणों से यह संभव नहीं हो पाया था। चुनाव की घोषणा के बाद बालेन शाह ने मेयर पद से इस्तीफा दे कर राष्ट्रीय स्वतंत्र पार्टी ज्वाइन कर लिया और झापा क्षेत्र संख्या पांच से पूर्व पीएम केपी शर्मा ओली के खिलाफ मैदान में आ गए। मतगणना में वे ओली से काफी बढ़त बनाए हुए हैं। देर रात तक संपन्न होने वाले यहां के मतगणना के परिणाम का इंतजार करना होगा। इस चुनाव में अचरज यह है कि पुरानी पार्टी के नेताओं में ओली, गगन थापा, उपेंद्र यादव, हृदयेश त्रिपाठी आदि रास्वपा उम्मीदवारों से पीछे चल रहे हैं।

नेपाली कांग्रेस जो अपने परिवर्तित नेतृत्व के साथ चुनाव मैदान में थी, उसकी ऐसी दुर्गति सोच से परे है। नेपाली राजनीतिक विश्लेषकों का मत है कि पार्टी के पूर्व अध्यक्ष शेर बहादुर देउबा को अपमानित करके पार्टी से निष्कासित करने से इसके परंपरा गत वोटर नाराज हो गए और वे राष्ट्रीय स्वतंत्र पार्टी में शिफ्ट हो गए। पूर्व में देउबा की बनाई गई ओली और नेपाली कांग्रेस के गठबंधन की चुनावी रणनीति पर अमल हुआ होता तो दोनों पार्टियों का परिणाम इतना बुरा नहीं होता।

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