नेपाल में राजशाही की मांग और पूर्व नरेश ज्ञानेंद्र की बढ़ती लोकप्रियता से नेपाल में खलबली, लोकतंत्र के लिए गंभीर खतरा?

पूर्व राजा ज्ञानेन्द्र की रैली में सीएम योगी का फोटो दिखाने वाले प्रदीप विक्रम राणा की तलाश में जुटी पुलिस

उमेश चन्द्र त्रिपाठी/मनोज कुमार त्रिपाठी

काठमांडू नेपाल! नेपाल में जिस तरह राजा समर्थकों और हिंदूवादी संगठनों की सक्रीयता बढ़ रही है, उसे हिंदू राष्ट्र के पुनर्वापसी की बढ़ रही मांग की दृष्टि से देखा जाना चाहिए। पिछले दिनों पूर्व नरेश ज्ञानेंद्र के स्वागत में काठमांडू स्थित त्रिभुवन अंतर्राष्ट्रीय हवाई अड्डे से लेकर महराजगंज स्थित उनके निर्मल निवास तक उमड़ी भीड़ के संदेश को हल्के में लेने की भूल नेपाल में कछुआ चाल चल रही लोकतंत्र के लिए खतरा हो सकता है। इस रोज राजा समर्थकों की भीड़ के “राजा आओ देश बचाओ” नारे से आसमान गूंजायमान था। नेपाल की ओली सरकार और सभी लोकतंत्र समर्थक दलों के लिए हैरानी का विषय यह था कि सैकड़ों हाथों में पूर्व नरेश ज्ञानेंद्र के पोस्टर के साथ यूपी के सीएम योगी आदित्यनाथ का भी पोस्टर लहरा रहा था। योगी आदित्यनाथ भारत में तेजी से उभरते हुए हिंदुत्व का बड़ा चेहरा हैं जो नेपाल के हिंदूवादी संगठनों के रोल माडल भी हैं। नेपाल के 80 प्रतिशत से अधिक हिंदू घरों में पूर्व नरेश ज्ञानेंद्र, स्वर्गीय नरेश वीरेंद्र विक्रम के साथ योगी आदित्यनाथ का फोटो टंगा हुआ देखा जा सकता है।

यूपी में गोरखपुर स्थित गोरक्षपीठ भारत सहित नेपाल के हिंदू जनमानस का भी पूज्य धार्मिक स्थल है। योगी आदित्यनाथ इस पीठ के महंत भी हैं इस नाते भी इनकी स्वीकार्यता नेपाल के हिंदू जनमानस में है। पूर्व नरेश ज्ञानेंद्र के स्वागत में उमड़ी भीड़ के हाथों में योगी का पोस्टर देख लोकतंत्र समर्थकों की प्रतिक्रिया थी कि नेपाल में हिंदू राष्ट्र की पुनर्वापसी के पीछे भारत है।

नेपाल में योगी समर्थकों का कहना है कि यह नेपाल के हिंदू जनमानस और हिंदू संगठनों का अपना कार्यक्रम है जिसकी अगुवाई राजशाही समर्थक राजनीतिक दल राष्ट्रिय प्रजातंत्र पार्टी के हाथ में है। वे कहते हैं कि दुनिया में कहीं भी हिंदू नेता हैं तो वे हमारे प्रेरणास्रोत हैं। जहां तक यूपी के सीएम योगी आदित्यनाथ की बात है तो वे हमारे पूज्यनीय भी हैं और रोल माडल भी हैं।

नेपाल में दर असल हिंदू संगठनों में यह हलचल तब शुरू हुआ जब नेपाल गणतंत्र दिवस 18 फरवरी को पूर्व नरेश ज्ञानेंद्र ने कहा कि वे जनता की सेवा करने को इच्छुक हैं और इसके लिए उनका समर्थन चाहते हैं। इसी के साथ उन्होंने यह भी कहा कि वे देश हित में राजगद्दी छोड़े थे, इसे कमजोरी माना गया। इतिहास मिटाया जा रहा है। त्याग किसी की कमजोरी नहीं होती। हमारी इच्छा सदैव सभी को साथ लेकर चलने की रही है। राजा के इस बयान के बाद नेपाल की राजनीति में भूचाल आना स्वाभाविक था। ज्ञानेंद्र के इस बयान के बाद उत्साहित हिंदू संगठन और राजा वादी दल राष्ट्रिय प्रजातंत्र पार्टी ने काठमांडू से लेकर भारतीय सीमा से सटे नेपाली इलाकों तक राजा के समर्थन में रैलियां निकाली।

नेपाल में बयान देने के बाद ज्ञानेंद्र
भारत और नेपाल के धार्मिक यात्रा पर
निकल लिए। वे गोरखपुर स्थित गोरक्षपीठ भी गए जहां उनका योगी आदित्यनाथ से मिलने का कार्यक्रम था लेकिन कुंभ की व्यस्तताओं के कारण योगी और ज्ञानेंद्र की मुलाकात नहीं हो पाई। भारत भ्रमण के बाद वे नेपाल के तीर्थस्थलों के भ्रमण पर रहे। उनका तीन हफ्ते का प्रवास पोखरा में था जहां उन्होंने अपने खास सलाहकारों से
भविष्य की रणनीति पर चर्चा की।

नेपाल में राजा वादी समर्थकों की सक्रीयता के बीच नेपाली कांग्रेस, नेकपा एमाले और नेकपा माओवादी केंद्र के शीर्ष नेताओं ने एक स्वर में इसका विरोध किया है। प्रधानमंत्री एवं एमाले अध्यक्ष केपी शर्मा ओली, कांग्रेस अध्यक्ष शेर बहादुर देउवा और माओवादी अध्यक्ष पुष्प कमल दहाल ‘प्रचंड’ ने राजतंत्र को सख्त शब्दों में खारिज कर दिया। राजतंत्र के खिलाफ सभी नेताओं ने एक स्वर से कहा कि नेपाली जनता ने जिस राजतंत्र को उखाड़कर फेंक दिया था, उसे फिर से कहां से और कैसे वापस लाने की बात की जा रही है? अगर सिर्फ किसी को कुर्सी पर बैठने से वह राजा बन सकता है, तो क्या हर कुर्सी पर बैठने वाला व्यक्ति राजा हो जाएगा?” माओवादी अध्यक्ष पुष्प कमल दहाल ‘प्रचंड’ ने राजतंत्र की वापसी की कोशिशों को खतरनाक बताया। कहा कि नेपाली जनता ने अपने संघर्ष से राजतंत्र को खत्म किया था। अब अगर सामंती ताकतें दोबारा सिर उठाने की कोशिश करेंगी, तो जनता फिर से उन्हें खत्म कर देगी। इतिहास पीछे नहीं लौट सकता।” प्रधानमंत्री ओली ने कहा कि पूर्व नरेश को कुर्सी की इतनी चाह है तो वे राजनीतिक दल गठित कर चुनाव में आएं।

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लेकिन एक सवाल तो है कि नेपाल में राजशाही खात्मे के इतने दिन बाद यदि फिर राजशाही का समर्थन करने वालों की संख्या में भारी इजाफा हुआ तो इसके पीछे कहीं न कहीं चुनी हुई लोकतांत्रिक सरकारों की विफलता ही है। पूर्व नरेश की बढ़ती स्वीकार्यता को लोकतंत्र के लिए गंभीर खतरा मानने वाले लोग भी यह स्वीकार कर रहे हैं कि नेपाल में लोकतांत्रिक व्यवस्था को दो दशक हो चुके हैं, लेकिन क्या यह जनता के मूल अधिकारों की रक्षा करने में सफल हो पाई है? यह सवाल आज हरजुबान पर है और इसका उत्तर सरकार के पास नहीं है। लोग मान रहे हैं कि सरकार यदि केवल कुर्सी के अदला बदली का खेल खेलती रही तो जनता का मूड बदलते देर नहीं लगेगा। यदि नेपाल के शासक चाहते हैं कि लोकतंत्र वास्तविक रूप से मजबूत हो तो उन्हें वे कदम उठाने होंगे जो जनता के जीवन को बदल दें और हर व्यक्ति को अपने अधिकारों के लिए आवाज उठाने का साहस प्रदान करें। लोकतांत्रिक हिमायती दलों के पास यह मौका अभी भी है। राजशाही की बढ़ रही मांग और पूर्व नरेश ज्ञानेंद्र की बढ़ रही स्वीकार्यता नेपाली जनता को परिवर्तन की अनुभूति न करा पाने वाली लोकतांत्रिक सरकारों को चेतावनी है, नहीं चेते तो नेपाल को कभी भी भारी उथल पुथल क सामना करना पड़ सकता है।

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