मनोज कुमार त्रिपाठी
काठमांडू ! नेपाल की कमान संभालने से पहले ही कार्की ने प्रधानमंत्री नरेंद्र मोदी की जमकर तारीफ की है। कार्की ने कहा कि मैं मोदी जी को नमस्कार करती हूं। मुझ पर मोदी जी का बहुत अच्छा प्रभाव है। उन्होंने एक इंटरव्यू के दौरान कहा कि वह इस जिम्मेदारी के लिए तैयार हैं। नेपाल में हालिया मूवमेंट की अगुवाई कर रहे Gen-Z ग्रुप ने मुझ पर विश्वास जताया है। भले ही मैं छोटी अवधि के लिए ही सरकार की अगुवाई करूं।
उन्होंने कहा कि मेरी पहली प्राथमिकता उन लोगों का सम्मान करने की होगी, जिन्होंने प्रदर्शनों में अपनी जान खोई है। कार्की ने कहा कि हमारा पहला काम प्रोटेस्ट के दौरान मारे गए लोगों के परिवार वालों के लिए कुछ करने का होगा। कार्की ने नेपाल के समर्थन को लेकर भारत की भूमिका की बात करते हुए कहा कि मैं भारत का बहुत सम्मान करती हूं और उनसे प्यार करती हूं।
उन्होंने कहा मैं मोदी जी की कार्यशैली से प्रभावित हूं। भारत ने नेपाल की हमेशा बहुत मदद की है।
बता दें कि कार्की नेपाल की पहली महिला चीफ जस्टिस रही हैं। उन्होंने 2016 में यह पद संभाला था लेकिन उन पर सरकार के काम में दखल देने का आरोप लगाकर महाभियोग लाया गया था। कार्की ने इसके खिलाफ सुप्रीम कोर्ट का रुख किया था, कोर्ट ने इसके बाद उन्हें राहत देने से फैसले को पलट दिया था।
इधर बुधवार को काठमांडू स्थित आर्मी हेडक्वार्टर में करीब 9 घंटे तक अहम बैठक चली। इसमें नई सरकार को लेकर सहमति नहीं बन सकी। हामी नेपाली एनजीओ की ओर से पूर्व जस्टिस सुशीला कार्की के नाम का प्रस्ताव रखा जिसका समर्थन काठमांडू के मेयर बालेंद्र शाह (बालेन) ने भी किया, लेकिन शर्त रखी कि पहले संसद भंग हो, तभी अंतरिम सरकार बने।
हालांकि अन्य जेन-जी समूहों ने सुशीला कार्की के नाम का विरोध किया। नेपाली सेना ने सभी जेन-जी समूहों से आज वार्ता में शामिल होने की अपील की है।
संवैधानिक विशेषज्ञों के मुताबिक मौजूदा हालात में राष्ट्रपति के पास दो विकल्प हैं, जिसमें पहला ये है कि संसद में मौजूद किसी सदस्य को प्रधानमंत्री नियुक्त किया जाए जिसे आंदोलनकारी स्वीकार करें। इसके बाद कैबिनेट की सिफारिश पर संसद भंग कर चुनाव कराया जा सकता है। दूसरा रास्ता है कि राष्ट्रपति आंदोलनकारियों द्वारा प्रस्तावित सर्वसम्मत उम्मीदवार को प्रधानमंत्री नियुक्त करें। हालांकि संविधान में इसका प्रावधान नहीं है, लेकिन जन आंदोलनों के बाद कई बार स्थापित संवैधानिक परंपराओं से इतर भी फैसले लिए गए हैं।





