नेपाल की प्रधानमंत्री सुशीला कार्की के समक्ष चुनौतियों का पहाड़,नेपाल का पुनर्निर्माण बड़ी चुनौती

भगवान पशुपतिनाथ ही नेपाल की जनता को इस त्रासदी से उबारेंगे

उमेश चन्द्र त्रिपाठी

काठमांडू नेपाल! नेपाल में काफी जद्दोजहद के बाद सर्वोच्च न्यायालय की पूर्व न्यायाधीश सुशीला कार्की को अंतरिम सरकार की मुखिया मनोनीत किया जा सका है। उम्मीद है कि वे अपने अनुभवों से नेपाल को नया जीवन दे पाने में कामयाब होंगी। सुशीला कार्की न्याय विद के साथ एक राजनीतिक परिवार से जुड़े रहने के नाते वे परिपक्व राजनीतिज्ञ भी हैं। इसकी झलक तब देखने को मिली जब जेन जी के तरफ से उनका नाम फाइनल होने के बाद भी वे प्रधानमंत्री बनने को लेकर हड़बड़ी में नहीं दिखीं। प्रधानमंत्री पद की शपथ उन्होंने तभी ली जब राष्ट्रपति रामचंद्र पौड़ेल को उनकी संसद विघटन की मांग को मानना पड़ा।

सुशीला कार्की के इस बात के सभी कायल हुए कि यदि पुराने प्रतिनिधि सभा का ही नेतृत्व करना है तो भ्रष्टाचार मुद्दा जिसके खिलाफ इतना बड़ा आन्दोलन हुआ, उससे पार पाना संभव नहीं है। उन्होंने दो टूक कहा कि वे एक भ्रष्ट सरकार का नेतृत्व नहीं करना चाहेंगी।

सुशीला कार्की के पति दुर्गा प्रसाद सुवेदी का ताल्लुक नेपाली कांग्रेस से था जिन्हें स्वर्गीय गिरिजा प्रसाद कोइराला का नजदीकी माना जाता है। दुर्गा प्रसाद सुवेदी पर 1973 में रायल नेपाल के जहाज के अपहरण का भी आरोप है। इस घटना पर उनकी एक पुस्तक खूब चर्चा रही।

बहरहाल सुशीला कार्की के पति का नेपाली कांग्रेस से ताल्लुक होने का कोई छाप इन पर नहीं है और न ही नेपाली जहाज के अपहरण से भी इनका कोई लेना देना रहा। वे तब भी अपनी मर्जी की मालिक थीं और आज भी। बतौर न्यायाधीश उनके कई फैसले चर्चा में रहे जिसमें नेपाली कांग्रेस के एक मुस्लिम नेता के खिलाफ फैसला राजनीतिक गलियारों में भूचाल जैसा था। उनकी जो कार्यशैली और दृढ़ इच्छा शक्ति है निसंदेह नेपाल को उसका फायदा मिलेगा।

हालांकि कि समय कम है, छः महीने बाद होने वाले चुनाव का परिदृश्य क्या होगा, इस पर कुछ भी कयासबाजी ठीक नहीं है। आगामी चुनाव को लेकर भारत विरोधी और भ्रष्टतम सरकार का नेतृत्व करने वाले केपी शर्मा ओली को सत्ता से उखाड़ फेंकने वाले जेन जी के नौजवानों का रुख अभी स्पष्ट नहीं है। वे अलग कोई राजनीतिक दल गठित करेंगे या मौजूदा किसी दल के साथ आएंगे, यह भी तय नहीं है। भविष्य के नेपाल में साफ-सुथरी सरकार के लिए उन युवाओं का राजनीतिकरण जरूरी है।

बेहद कम समय में सुशीला कार्की के समक्ष नेपाल को फिर से सजाने संवारने की चुनौती भी है। आगजनी और तोड़ फोड़ में नेपाल को खरबों का नुकसान हुआ है। नेपाल को फिर से बनाने में इतनी बड़ी रकम जुटाना आसान नहीं है। इसके लिए कौन कौन देश आगे आते हैं, यह काफी कुछ नई सरकार के विदेश नीति पर निर्भर करेगा। पर्यटन जो नेपाल के आर्थिक स्रोत का बड़ा जरिया है, उसे स्थापित करना भी बड़ी चुनौती है। जिस तरह नेपाल के ऐतिहासिक इमारतों को चुन-चुन कर फूका गया है, वे सब सरकार की संपत्ति थी, उन्हें दुबारा उसके पुराने स्वरूप में ला पाना मुश्किल होगा। कुछ वर्ष पूर्व आए भूकंप से नेपाल में जितनी तबाही नहीं हुई थी, नेपाली युवाओं ने अपने हाथों से नेपाल को उससे बड़ी त्रासदी दे दी। सरकार निकम्मी थी, उसे हटाने के लिए आंदोलन ठीक था लेकिन सरकार की संपत्तियों को सुपुर्द-ए-खाक करना नादानी है।

काठमांडू से लेकर नेपाल के तमाम शहरों कस्बों में जले हुए मकान, सरकारी इमारतों को देख ऐसा लगता है कि इसका पुनर्निर्माण आसान नहीं है। हर जुबान पर चर्चा है कि भगवान पशुपतिनाथ ही नेपाल को नया जीवन देंगे।

सुशीला कार्की की जिद भ्रष्टाचार मुक्त नेपाल बनाने के साथ भ्रष्टाचार मुक्त राजनीति की भी है। नेपाल में अभी जितने भी राजनीतिक दल है, उसके सारे बड़े नेताओं के हाथ भ्रष्टाचार से सने हुए हैं, ऐसे में राजनीति से भ्रष्टाचार खत्म करना भी बड़ी चुनौती है।

सुपुर्द-ए-खाक हुए नेपाल के दोषियों की शिनाख्त और उन्हें सजा देने के लिए चिन्हित करना भी चुनौती है क्योंकि अभी तक इसकी जिम्मेदारी किसी ने ली नहीं है। जेन जी आंदोलनकारियों का कहना है कि यह कृत्य नेपाल के दुश्मनों की है जो उनके आंदोलन में घुस आए। यह तय कर पाना आसान नहीं है कि आखिर वे कौन लोग थे?

राजधानी काठमांडू जिसे काष्ठमंडप भी कहा जाता था, अब स्वाहा हो चुका है। मात्र 48 घंटे की अराजकता में नेपाल बर्बाद हो गया।

सरकार और विपक्ष भाग खड़े हुए। मंत्रियों को अपनी जान बचाने को इधर-उधर भागना पड़ा। उन्हे घर के पिछवाड़े, नदी नालों में कूद कर भागते हुए देखा गया।

आंदोलनकारियों के पकड़ में जो आए उनकी जमकर कुटाई हुई। युवाओं में सरकार हो या विपक्ष सभी नेताओं के प्रति ऐसा गुस्सा था कि चाहे संसद भवन हो या राष्ट्रपति कार्यालय, सिंह दरबार हो या रेवेन्यू भवन सब में आग लगा दी गई। सारे जरूरी दस्तावेज जलकर स्वाहा हो गए। जेलों से भारी संख्या में कैदी फरार हो गए। पूर्व प्रधानमंत्री, प्रधानमंत्री, दर्जनों मंत्रियों के आवास फूंक दिए गए।

भारत नेपाल संबंधों को नया आयाम देने वाले पूर्व प्रधानमंत्री, जिन्हें नेपाल का गांधी भी कहा जाता है, स्वर्गीय गिरिजा प्रसाद कोइराला की प्रतिमा पर वीरगंज में हथौड़ा चलाते हुए देखा गया।

जेन जी समूह ने एक सही फैसला लिया जो उन्होंने ईमानदार और निडर महिला न्यायविद को अंतरिम सरकार का मुखिया चुना। सुशीला कार्की नेपाल की पहली महिला मुख्य न्यायाधीश भी थीं और अब पहली महिला प्रधानमंत्री का खिताब भी उन्ही के खाते में दर्ज हुआ।

इधर जेन जी समूह में इस बात को लेकर वैचारिक मतभेद भी था कि अंतरिम सरकार का नेतृत्व धर्मनिरपेक्ष विचारधारा का हो या राज संस्था विचारधारा का? सुशीला कार्की की शिक्षा वाराणसी के बीएचयू में भी हुई है और ये भारत के प्रधानमंत्री को फालो ही नहीं करती बल्कि भारत से बहुत प्यार करती हैं। जेन जी समूह के 80 प्रतिशत से अधिक युवाओं की ये पहली पसंद थीं। नई सरकार को लेकर तमाम तरह की आशंकाएं थीं जैसे भारत के साथ संबंध। राजशाही के जमाने से ही नेपाल का भारत से उतार चढ़ाव जैसा संबंध रहा है। लोकतंत्र बहाली के बाद ज्यादातर नेपाली सरकारें भारत से मतलब भर का संबंध रखती थी। अभी- अभी तख्तापलट के शिकार हुए ओली की शिनाख्त कट्टर भारत विरोधी की रही है।

उन्होंने नेपाल की जनता में भारत के खिलाफ जहर घोलने में कोई कसर नहीं छोड़ा। सत्ता से हटने के बाद भी सेना के कैंप शिवपुरी से उन्होंने तख्तापलट के लिए मनगढ़ंत कहानियों के साथ भारत पर आरोप मढ़ा।

सनातनी विचारधारा की पूर्व न्यायाधीश सुशीला कार्की के हाथ नई सरकार की कमान भारत के लिए सुखद संकेत है। इस बात की कामना की जानी चाहिए कि सुशीला कार्की के नेतृत्व में नेपाल में लोकतंत्र मजबूत हो और वह फिर से उठ खड़ा होने में सक्षम हो।

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