काठमांडू के एक पत्रकार का एक मित्र पत्रकार के प्रति दिल को छूने वाला मार्मिक लेख 

विना अपना नाम लिखे मित्र पत्रकार को दिया भावपूर्ण श्रद्धांजलि 

उमेश चन्द्र त्रिपाठी/मनोज कुमार त्रिपाठी 

भैरहवा नेपाल! वरिष्ठ पत्रकार चेतन दाई (भाई) के साथ मेरी नजदीकी संबंध की शुरुआत वर्ष 2062 मंसिर (नवंबर/दिसंबर 2005) से हुई थी। उस समय मैं नेपाल वन टेलीविजन में पाल्पा, गुल्मी और अर्घाखांची जिलों की रिपोर्टिंग करता था और पाल्पा जिला मुख्यालय तानसेन में रहता था। मेरा गृह जिला भी पाल्पा ही है।

अचानक एक दिन चैनल ने मुझे निर्देश दिया कि फिलहाल पाल्पा छोड़कर बुटवल जाना होगा। जब मैंने पारिश्रमिक की बात की, तो बताया गया कि ₹10,000 मासिक वेतन मिलेगा और अन्य सुविधाएं भी मिलेंगी। यह सुनकर मैं अगले दिन बुटवल पहुंच गया, लेकिन मैंने भैरहवा को अपना गंतव्य चुना।

खबरों के वीडियो कैसेट्स (फाइलें) हर दिन की तरह काठमांडू भेजने होते थे, इसलिए भैरहवा रहना ज्यादा सुविधाजनक था। साथ ही, मेरे मामा का घर मधवलिया और ससुराल भैरहवा के आसपास ही था, जिससे यह निर्णय और भी सरल हो गया। उस समय देश हिंसक संघर्ष के दौर से गुजर रहा था,कब कहां क्या हो जाए कोई भरोसा नहीं था।

भैरहवा आने के अगले दिन महेन्द्र सभागृह में शाही दरबार से जुड़ा एक कार्यक्रम था। जानकारी मिलने पर मैं वहां पहुंच गया। वहां मैं किसी को जानता नहीं था। उद्घोषणा चेतन दाई कर रहे थे और उनके भाई शम्भू पंत छायांकन कर रहे थे।

चेतन दाई इमेज टीवी में और शम्भू दाई नेपाल टीवी में काम करते थे। वहीं माधव ढुंगाना (कान्तिपुर), कुलमणि ज्ञवाली (अखबार), और सारदा मल्ल (चैनल नेपाल) से भी वहीं परिचय हुआ। बाद में दीपेश पछाई, टीपी भुसाल और मुकेश पोखरेल से भी जान-पहचान हुई।

शम्भु दाई का मिलन चौक में “फोटो फेमस” नाम से स्टूडियो था। उस समय मेरे पास अपना कैमरा नहीं था, इसलिए मैं कार्यक्रम का वीडियो लेने उनके स्टूडियो गया। वहीं चेतन दाई से परिचय हुआ, उन्होंने वीडियो दिया और मैं वह वीडियो लेकर हवाई अड्डा गया और काठमांडू भेजा। खबर को फैक्स करके भेजा।

उस दिन से चेतन दाई से मेरी नजदीकी बढ़ती गई। हम धीरे-धीरे एक साथ विभिन्न कार्यक्रमों में शामिल होने लगे। चेतन दाई का छोटा-सा परिवार था भाभी गंगा पंत, बेटे उत्सव पंत और उमंग पंत छोटा परिवार, सुखी परिवार।

घूमते-फिरते मुझे पता चला कि उनका विशेष लगाव लुंबिनी से है। वे प्रायः वहां जाते रहते थे। मुझे जब यह समझ आया तो मैं भी उनके और करीब आने लगा। मुझे पर्यटन और अर्थव्यवस्था से जुड़ी खबरों में रुचि थी। बाद में जब मैं आर्थिक कारोबार से जुड़ा, तो मैं भी पर्यटन और आर्थिक विषयों पर अधिक लेख लिखने लगा।

चेतन दाई विदेशों की यात्रा करते थे। हम उनकी यात्राओं की बातें सुनकर ऐसे महसूस करते जैसे खुद वहां गए हों। मैंने 2063 असार से भैरहवा में किराए के मकान में रहना शुरू किया और पत्नी सरिता सापकोटा व दो वर्ष की बेटी अभिलाषा शर्मा (जो अब कनाडा में हैं) को भी बुला लिया। हम एक साथ रहने लगे।

समय बीतता गया। चेतन दाई को फोटोग्राफी और डॉक्यूमेंट्री निर्माण में भी रुचि थी। उन्हें पक्षियों और ताल-तलैयों के वीडियो-फोटो लेने में भी गहरी रुचि थी। कई बार मैं उनके साथ जाता, कभी-कभी वे अकेले जाते और बाद में दिखाते कि यह नया वीडियो बनाया है मैं भी उत्साह से देखता।

बाद में उनके बड़े बेटे उत्सव पंत अमेरिका में डीवी लॉटरी से जाकर बस गए। छोटे बेटे उमंग पंत भी ऑस्ट्रेलिया चले गए। तब घर में चेतन दाई और भाभी ही रह गए। दाई सिद्धार्थनगर स्थित नेपाल राष्ट्र बैंक में कार्यरत थे। वे समय-समय पर अपने जीवन की रोचक घटनाएं सुनाकर हंसा देते थे।

इसी बीच हम साथ में दो बार थाईलैंड, श्रीलंका और मलेशिया की यात्रा पर भी गए। उनका मुख्य फोकस बुद्ध जन्मस्थल लुंबिनी का प्रचार-प्रसार था। उन्होंने लुंबिनी पर बनाई गई डॉक्यूमेंट्री और फोटो कई जगह प्रदर्शित कीं। हमने भारत के सारनाथ, बोधगया, कुशीनगर की भी कई यात्राएं साथ कीं। नेपाल के भी अनेक स्थानों पर साथ-साथ गए।

चेतन दाई सिद्धार्थ होटल संघ (शान) के पर्यटन सलाहकार थे, और मैं प्रेस सलाहकार। हम अध्यक्ष सीपी दाई (चन्द्र प्रकाश श्रेष्ठ) के साथ भारत के कई शहरों और नेपाल के अनेक जिलों में पर्यटन प्रवर्द्धन कार्यक्रमों में भाग लेते थे। भैरहवा स्थित गौतम बुद्ध अंतर्राष्ट्रीय हवाई अड्डे का समय पर निर्माण और संचालन हो इसके लिए वे लगातार वीडियो, फोटो, समाचार और लेखों के माध्यम से दबाव बनाते थे।

बुद्ध के जीवन से जुड़े स्थलों रुपन्देही, कपिलवस्तु, नवलपरासी के प्रचार-प्रसार के लिए हम अक्सर भिक्षु मैत्री महास्थविर के साथ रहते थे। चेतन दाई और भिक्षु मैत्री पहले से मित्र थे और उन्होंने ही मेरा उनसे परिचय कराया।

वरिष्ठ पत्रकार चेतन पंत जी और उनके दोनों बच्चों का फाइल फोटो

हम उनके साथ श्रीलंका भी गए थे। समय के साथ हमारी नजदीकी और भी बढ़ी। हम तीनों में एक बहुत अच्छा मेल था। बुद्ध दर्शन की गूढ़ बातें हम भिक्षु मैत्री से सुना करते थे।

इसी बीच, भिक्षु मैत्री को आंतों में कैंसर का पता चला। अभी भी वे उपचाररत हैं। चेतन दाई को पान और पान मसाला खाने की आदत थी। कुछ खाने के बाद दांत को सलाई से कुरेदने की भी आदत थी। लेकिन वे अपने स्वास्थ्य की खूब परवाह करते थे।

यह बात बिक्रम संवत 2078 (2021) के अंतिम समय की है। माता वैष्णोदेवी के दर्शन के बाद लौटते समय बनारस हिंदू विश्वविद्यालय में जांच के दौरान उनके मसूड़ों में कैंसर का पता चला। यह बिक्रम संवत 2018 चैत्र (मार्च 2022) की बात है। परिवार से सलाह कर चेतन दाई ने वहीं सर्जरी कराने का निर्णय लिया।

बेटे दोनों देश लौट आए। चेतन दाई भैरहवा से बनारस गए। चैत्र के अंत में उनकी सर्जरी हुई और कुछ समय बनारस में ही रहे। फिर नियमित जांच दिल्ली में होती रही। वहीं कीमोथेरेपी भी चलती रही। अमेरिका में रह रहे उत्सव ने अपने व्यवसाय की चिंता छोड़कर पिता के इलाज में भरपूर मदद की।

ऑस्ट्रेलिया में रह रहे उमंग ने भी हर-संभव सहयोग किया। वे ऑस्ट्रेलिया छोड़कर माता-पिता के साथ रहने लगे। भाभी गंगा जी ने दिन-रात चेतन दाई की सेवा की।

लगभग दो साल पहले, बिक्रम संवत 2080 जेठ (मई 2023) में दिल्ली फॉलोअप के दौरान पता चला कि कैंसर दूसरी ओर भी फैल चुका है। बेटे फिर लौट आए। श्रावण में चेतन दाई काठमांडू आए और हरि-सिद्धि स्थित नेपाल कैंसर अस्पताल में कीमोथेरपी के लिए पूरे परिवार के साथ रहने लगे।

धीरे-धीरे चेतन दाई की हालत बिगड़ती गई। बेटों ने लाखों खर्च किए, यह सोचकर कि पिता जी ठीक हो जाएंगे। भाभी के अनुसार, दाई के इलाज में ₹ 2 करोड़ से ज्यादा खर्च हुआ। इसी दौरान, 2080 भादों (अगस्त 2023) से मुझे भी कैंसर ने पकड़ लिया। मैं भी अब इलाज करवा रहा हूं।

2081 असार (जून 2024) में चेतन दाई को भैरहवा उनके घर लाया गया। बड़े बेटे उत्सव अमेरिका से आ चुके थे और छोटे बेटे उमंग माता-पिता के साथ ही थे।

अंततः, 2081 श्रावण 20 (4 अगस्त 2024) को चेतन दाई इस संसार को छोड़कर चले गए। उस समय मैं भी सर्जरी के बाद काठमांडू में ही मौजूद था। रात को फेसबुक पर खबर देखकर मेरे पैर कांप गए, शरीर सून्य हो गया। पूरी रात नींद नहीं आई। अब भी विश्वास नहीं होता कि चेतन दाई हमारे बीच नहीं हैं।

अक्सर सुबह घर आकर कहते “सरिता, ग्रीन टी बना।” आज भी लगता है, जैसे अब वे आ जाएंगे। पोता आगमन कहता “हजुरबुबा आए।”

तिथि के अनुसार, आज सोमवार चेतन दाई की प्रथम पुण्यतिथि है। मैं अब तक उन्हें श्रद्धांजलि नहीं दे पाया था। आज इस लेख के माध्यम से चेतन दाई को श्रद्धांजलि अर्पित करता हूं, साथ ही भाभी गंगा, भतीजा उत्सव और उमंग तथा पूरे परिवार के प्रति अपनी गहरी संवेदना प्रकट करता हूं।

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