चुनाव केवल सत्ता प्राप्ति का माध्यम नहीं, बल्कि जनता की संप्रभुता का प्रतीक है – दिनेश त्रिपाठी वरिष्ठ अधिवक्ता सुप्रीम कोर्ट नेपाल
मनोज कुमार त्रिपाठी
भैरहवा नेपाल! रूपन्देही के पांचों संसदीय क्षेत्रों में चुनावी माहौल अपने चरम पर है और लोकतंत्र के इस महापर्व के बीच वरिष्ठ अधिवक्ता दिनेश त्रिपाठी ने राजनीतिक दलों की दिशा और दृष्टि पर गंभीर सवाल खड़े किए हैं। उनका कहना है कि चुनाव केवल सत्ता प्राप्ति का माध्यम नहीं, बल्कि जनता की संप्रभुता का प्रतीक है—जहां मतदाता यह तय करता है कि राष्ट्र किस दिशा में आगे बढ़ेगा। लेकिन वर्तमान परिदृश्य में अधिकांश दल स्पष्ट एजेंडा, ठोस रोडमैप और दीर्घकालिक विजन प्रस्तुत करने में विफल दिखाई दे रहे हैं।
उन्होंने विशेष रूप से नए चेहरों और सोशल मीडिया के शोर-शराबे को “जमीनी हकीकत से अलग” बताते हुए कहा कि केवल “पुराने को हटाओ, नए को लाओ” का नारा पर्याप्त नहीं है। सवाल यह है कि नया क्या है? राजनीतिक इतिहास क्या है? सामाजिक योगदान क्या है? और जनता के लिए ठोस कार्ययोजना क्या है? हाल ही में आयोजित एक प्रेस मीट का उल्लेख करते हुए उन्होंने कहा कि जब कुछ प्रत्याशियों से उनके योगदान और विचारधारा पर सवाल किए गए, तो संतोषजनक जवाब सामने नहीं आ पाए, जिससे उनकी तैयारी और प्रतिबद्धता पर प्रश्नचिह्न लग गया।
टिकट वितरण को लेकर भी उन्होंने गंभीर आरोपों की ओर संकेत किया। उनका कहना है कि स्वयं पार्टी के भीतर से टिकट बिक्री और लेन-देन के आरोप सामने आ रहे हैं, जिससे “क्लीन पॉलिटिक्स” का दावा खोखला प्रतीत होता है।
उन्होंने यह भी कहा कि जो दल सुशासन और पारदर्शिता की बात करते हैं, उन्हें पहले अपने संगठनात्मक ढांचे में पारदर्शिता साबित करनी चाहिए।
वरिष्ठ अधिवक्ता दिनेश त्रिपाठी के अनुसार लोकतंत्र संघर्ष और त्याग की उपज है। यदि उम्मीदवारों के पास न स्पष्ट विचारधारा है, न जनसेवा का अनुभव और न ही विकास का ठोस खाका, तो केवल प्रचार और भावनात्मक नारों के सहारे सत्ता तक पहुंचना देश के भविष्य के लिए खतरा बन सकता है।
उन्होंने अंत में मतदाताओं से अपील की कि वे सोशल मीडिया की लहर या प्रचार के प्रभाव में आने के बजाय उम्मीदवारों की योग्यता, प्रतिबद्धता और जनहित में किए गए वास्तविक कार्यों को परखकर अपना मताधिकार प्रयोग करें, ताकि रूपन्देही में सशक्त नेतृत्व और राष्ट्र में सुशासन की स्थापना हो सके।