रूपंदेही के क्षेत्र नंबर तीन से प्रतिनिधि सभा के उपचुनाव में चुनावी मैदान में उतर सकते हैं सुप्रीम कोर्ट नेपाल के वरिष्ठ अधिवक्ता दिनेश त्रिपाठी?

बोले अब बदलाव की बारी है। राजनीति मेरे लिए सत्ता का साधन नहीं वल्कि सेवा का माध्यम है – दिनेश त्रिपाठी वरिष्ठ अधिवक्ता सुप्रभात कोर्ट नेपाल

मनोज कुमार त्रिपाठी

रूपंदेही नेपाल!
सुप्रीम कोर्ट नेपाल के वरिष्ठ अधिवक्ता, लोकतंत्र सेनानी और सामाजिक कार्यकर्ता ने संकेत दिया है कि वे रूपंदेही क्षेत्र से आगामी संसदीय चुनाव में उतरने पर गंभीरतापूर्वक विचार कर रहे हैं। अपने हालिया दौरे में उन्होंने जनता से मिले फीडबैक को “परिवर्तन की पुकार” बताया और कहा कि अब लोग पुराने, निष्क्रिय और भ्रष्ट नेताओं से आजिज आ चुके हैं।

 

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उन्होंने कहा कि यह क्षेत्र एक नए नेतृत्व की बाट जोह रहा है,मैंने बीते दिनों रूपंदेही के कई हिस्सों का दौरा किया, आम लोगों, बुद्धिजीवियों, समाजसेवियों और युवाओं से गहन बातचीत की। जो बात उभरकर आई, वह यह कि जनता अब पुराने चेहरों को नकार चुकी है। ऐसे नेता जो चुनाव जीत कर जनता से कट जाते हैं, विकास की बात नहीं करते, भ्रष्टाचार में लिप्त रहते हैं उन्हें अब स्वीकार नहीं किया जा रहा।

वरिष्ठ अधिवक्ता ने बताया कि उन्हें विभिन्न वर्गों से चुनाव लड़ने का प्रस्ताव मिला है, ताकि इस ऐतिहासिक क्षेत्र को संसद में एक सशक्त और सजग आवाज मिल सके।
“यह क्षेत्र सिर्फ नेपाल का नहीं, वैश्विक मानचित्र पर एक पवित्र धरोहर है। गौतम बुद्ध की जन्मस्थली है। इतने बड़े सांस्कृतिक और आध्यात्मिक महत्व के बावजूद यह क्षेत्र विकास से वंचित है, जिसका कारण है। कमजोर नेतृत्व और अदृश्य प्रतिनिधित्व।

उन्होंने यह भी कहा कि वे इस समय चुनावी समीकरणों का गहराई से अध्ययन कर रहे हैं और जनता की नब्ज टटोल रहे हैं।

मैं फिलहाल सक्रिय विचार प्रक्रिया में हूं। यह मेरा ‘प्री-इलेक्शन एक्सरसाइज’ है। मैं जनता की मनःस्थिति समझ रहा हूं, और संभावित समीकरणों पर मंथन कर रहा हूं। जब मुझे लगेगा कि क्षेत्र और राष्ट्र दोनों के हित में मेरी उम्मीदवारी उपयुक्त है, तो मैं निर्णय लूंगा,” उन्होंने स्पष्ट किया।

उन्होंने नेपाल की मौजूदा राजनीतिक व्यवस्था पर भी तीखी टिप्पणी की

आज संसद में गुणवत्तापूर्ण बहस नहीं होती, भ्रष्ट और आपराधिक प्रवृत्ति के लोग राजनीति में हावी हो चुके हैं। यदि विचारशील, पढ़े-लिखे और ईमानदार लोग पीछे रहेंगे, तो राजनीति की सड़ांध दूर नहीं होगी।

उन्होंने यह भी जोड़ा कि राजनीति को यदि बदला जाना है, तो मैदान में उतरकर बदलाव की मशाल जलानी होगी।

समस्या यह नहीं कि संविधान खराब है, समस्या यह है कि उसके क्रियान्वयनकर्ता भ्रष्ट और अवसरवादी हैं। यदि व्यवस्था को बचाना है, तो अच्छे लोगों को आगे आना ही होगा।

अपनी बातों को समाप्त करते हुए अंत में उन्होंने कहा मैं जनसरोकार की राजनीति का पक्षधर हूं। राजनीति मेरे लिए सत्ता का साधन नहीं, सेवा का माध्यम है। यदि क्षेत्र की जनता और शुभचिंतक साथ हैं, तो हम मिलकर बदलाव का इतिहास रच सकते हैं।

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