मनोज कुमार त्रिपाठी
मर्चवार/क्षेत्र नंबर–4।
जनता समाजवादी पार्टी (जसपा) से क्षेत्र नंबर चार के संसदीय प्रत्याशी ने चुनावी मैदान में उतरते हुए साफ कहा कि यह चुनाव सामान्य नहीं, बल्कि देश के भविष्य की दिशा तय करने वाला है। उन्होंने कहा कि विगत 37 वर्षों से वे इसी क्षेत्र में रहकर राजनीति और जनसेवा कर रहे हैं और आज जब देश विषम परिस्थिति से गुजर रहा है, ऐसे समय में अनुभवी और जिम्मेदार लोगों का संसद में पहुँचना अनिवार्य है।
प्रत्याशी ने बताया कि उनके राजनीतिक जीवन की शुरुआत जिला विकास समिति के उपसभापति पद से हुई थी। इसके बाद वे तीन बार सांसद चुने गए और चार बार जनता ने उन्हें दूसरे स्थान पर रखा, जिसे उन्होंने पूरी विनम्रता के साथ स्वीकार करते हुए निरंतर जनसेवा जारी रखी। उन्होंने कहा कि यह संसद सामान्य परिस्थितियों में गठित नहीं हो रही है, बल्कि जेएनजी आंदोलन, संसद विघटन और बाहरी प्रभावों के बीच देश एक गहरे राजनीतिक विभाजन से गुजर रहा है।
उन्होंने स्पष्ट किया कि मधेस संयुक्त लोकतांत्रिक मोर्चा, जिसमें जसपा सबसे बड़ी शक्ति है, संसद में एक परिवर्तनकारी भूमिका निभाएगा। मधेस आंदोलन में शहीद हुए सैकड़ों लोगों के बलिदान का उल्लेख करते हुए उन्होंने कहा कि आज भी मधेस से जुड़े कई मूलभूत मुद्दे अधूरे हैं, जिन्हें संसद में मजबूती से उठाना उनकी पहली प्राथमिकता होगी। उनके अनुसार, जसपा नई और पुरानी राजनीतिक शक्तियों के बीच एक सेतु का काम करेगी, ताकि संसद के भीतर टकराव नहीं, बल्कि समाधान की राजनीति आगे बढ़े।
विकास के सवाल पर विपक्ष के आरोपों को सिरे से खारिज करते हुए प्रत्याशी ने कहा कि मरचोआर क्षेत्र में जो भी ठोस विकास हुआ है, वह उनके कार्यकाल में ही हुआ है। उन्होंने सतही सिंचाई योजना, व्यापक विद्युतीकरण, शिक्षा के क्षेत्र में उच्च माध्यमिक विद्यालयों और पहले कैंपस की स्थापना, बीस से अधिक डीप ट्यूबवेल, केंद्रीय बजट से बनी सड़कें और सीमा तक सड़क संपर्क को अपनी प्रमुख उपलब्धियों के रूप में गिनाया। उन्होंने दावा किया कि यदि उनके कार्यों की निष्पक्ष तुलना की जाए, तो वे अपने विरोधियों से कहीं आगे साबित होंगे।
“चीफ साहब” के नाम से प्रसिद्ध नेता ने राजनीति से संन्यास के अपने पुराने बयान पर भी स्थिति स्पष्ट की। उन्होंने कहा कि उन्होंने 2084 के बाद सक्रिय चुनावी राजनीति से हटने की बात कही थी और आज भी उस पर कायम हैं। लेकिन वर्तमान विषम हालात में देश को अस्थिरता से बचाने के लिए इस चुनाव में उतरना उन्होंने अपना नैतिक कर्तव्य माना है। उनका कहना है कि आने वाली संसद में संविधान संशोधन एक अहम विषय होगा और उसमें मधेसवादी तथा जनआंदोलनों से जुड़े मुद्दों को संतुलित ढंग से सुलझाने के लिए अनुभवी नेतृत्व की जरूरत है।
जेएनजी आंदोलन पर बोलते हुए उन्होंने कहा कि आंदोलन के दौरान निर्दोष युवाओं की मौत बेहद दुखद थी, लेकिन बाद में घुसपैठियों द्वारा हिंसा, आगजनी और राष्ट्रीय संपत्तियों को नुकसान पहुँचाया गया। काठमांडू में हुए अरबों रुपये के नुकसान का जिक्र करते हुए उन्होंने कहा कि इसका बोझ अंततः जनता के विकास बजट पर पड़ेगा। उन्होंने आरोप लगाया कि आंदोलन को उग्र बनाने वालों के पास न तो अनुभव था और न ही नियंत्रण की क्षमता, जिसका खामियाजा पूरे देश को भुगतना पड़ा।
अंत में उन्होंने विश्वास जताया कि जनता अब भावनाओं नहीं, बल्कि अनुभव और जिम्मेदारी के आधार पर निर्णय लेगी। आने वाला चुनाव यह तय करेगा कि देश उग्रता के रास्ते जाएगा या संतुलित, अनुभवी और जिम्मेदार नेतृत्व के साथ स्थिरता की ओर बढ़ेगा।