काल भैरव के बगल में लगती है कोतवाल की कुर्सी
उमेश चन्द्र त्रिपाठी
वाराणसी! वाराणसी अपनी अनगिनत परंपराओं और रहस्यमयी मान्यताओं के लिए विश्वभर में प्रसिद्ध है। यहां हर गली, हर मंदिर और हर परंपरा अपने भीतर सदियों का इतिहास समेटे हुए है। इन्हीं परंपराओं में एक अनोखी परंपरा विशेश्वरगंज स्थित कोतवाली थाने से जुड़ी है, जहा स्थानीय मान्यता के अनुसार थानेदार की वास्तविक कुर्सी पर आज भी काशी के कोतवाल हैं। बाबा काल भैरव – विराजमान माने जाते हैं।
कहा जाता है कि काशी नगरी की सुरक्षा और व्यवस्था का दायित्व स्वयं भगवान शिव ने बाबा काल भैरव को सौंपा था। इसी कारण उन्हें “काशी का कोतवाल” कहा जाता है।
शहर के प्रसिद्ध काल भैरव मंदिर से जुड़ी यह मान्यता केवल धार्मिक विश्वास नहीं, बल्कि स्थानीय संस्कृति का हिस्सा बन चुकी है।
कोतवाली थाने में वर्षों से यह परंपरा चली आ रही है कि कोई भी प्रभारी निरीक्षक मुख्य कुर्सी पर सीधे नहीं बैठता। अधिकारी बगल में कुर्सी लगाकर अपना कार्य करते हैं। पुलिसकर्मियों का मानना है कि यह बाबा के प्रति सम्मान और आस्था का प्रतीक है।
स्थानीय लोगों के अनुसार, काशी में आने वाले कई प्रशासनिक और पुलिस अधिकारी अपनी जिम्मेदारी संभालने से पहले बाबा काल भैरव के दर्शन अवश्य करते हैं। यह परंपरा केवल धार्मिक भावना तक सीमित नहीं, बल्कि कर्तव्य के प्रति श्रद्धा और नैतिक जिम्मेदारी का प्रतीक भी मानी जाती है। करीब दो दशकों से तैनात रहे कुछ पुलिसकर्मियों का कहना है कि उन्होंने किसी भी थानेदार को उस प्रतीकात्मक कुर्सी पर बैठते नहीं देखा।
हालांकि इस परंपरा की शुरुआत कब हुई, इसका स्पष्ट ऐतिहासिक रिकॉर्ड उपलब्ध नहीं है, लेकिन स्थानीय जनमानस इसे बहुत पुरानी परंपरा मानता है।
काल भैरव मंदिर में प्रतिदिन चार बार आरती होती है, जिनमें रात्रि आरती सबसे महत्वपूर्ण मानी जाती है। बाबा को सरसों का तेल अर्पित करने की परंपरा विशेष रूप से प्रसिद्ध है। मंदिर में जलता अखंड दीप भक्तों की अटूट श्रद्धा का प्रतीक है। मान्यता है कि काशी में रहने और आने-जाने वालों पर बाबा की विशेष दृष्टि रहती है।
कोतवाली की यह परंपरा इसी सांस्कृतिक सोच को दर्शाती है – जहां कानून व्यवस्था मानव के हाथ में है, लेकिन नैतिक प्रहरी के रूप में आस्था का स्थान भी बना हुआ है।
आधुनिक समय में भले ही व्यवस्थाएं तकनीक और नियमों से संचालित होती हों, लेकिन काशी आज भी यह संदेश देती है कि परंपराएं केवल इतिहास नहीं होती, वे समाज की आत्मा होती हैं। “काशी के कोतवाल” बाबा काल भैरव की यह मान्यता उसी जीवंत सांस्कृतिक विरासत का उदाहरण है, जहा विश्वास और कर्तव्य साथ-साथ चलते हैं।