मनोज कुमार त्रिपाठी
भैरहवा/रूपंदेही।
क्षेत्र नंबर तीन से स्वतंत्र सांसद प्रत्याशी गोपाल भंडारी ने स्पष्ट शब्दों में कहा कि उनका चुनावी संघर्ष किसी पद के लिए नहीं, बल्कि राष्ट्रनिर्माण, सुशासन और वैचारिक मजबूती के लिए है। उन्होंने कहा कि वह पहले भी प्रदेश सभा चुनाव में बाल इंसा समर्थक के रूप में मैदान में उतर चुके हैं और तीसरे स्थान पर रहे थे, लेकिन अब वैचारिक मतभेदों के कारण उन्होंने स्वतंत्र उम्मीदवार के रूप में जनता के बीच जाने का फैसला किया है।

गोपाल भंडारी ने कहा कि वे आज भी बाल इंसा की मूल विचारधारा से जुड़े हैं, लेकिन जब सुशासन के मेरुदंड से समझौता होता दिखा, तो नैतिकता के आधार पर स्वतंत्र रास्ता चुनना जरूरी हो गया। उनका कहना है कि नेपाल को एक सनातन हिंदू राष्ट्र के रूप में स्थापित करना समय की मांग है, हालांकि वे सभी धर्मों के सम्मान के पक्षधर हैं।
उन्होंने भारत-नेपाल संबंधों पर जोर देते हुए कहा कि दोनों देशों का रिश्ता केवल कूटनीतिक नहीं, बल्कि रोटी-बेटी, धर्म और संस्कार का अटूट संबंध है। ऐसे में नेपाल में बढ़ते विदेशी हस्तक्षेप से दोनों देशों की सुरक्षा और सांस्कृतिक अस्मिता पर खतरा पैदा हो रहा है, जिसके खिलाफ आवाज उठाना आवश्यक है।
गोपाल भंडारी ने अपने विजन को साझा करते हुए कहा कि नेपाल और भारत के धार्मिक स्थलों को जोड़कर एक धार्मिक पर्यटन कॉरिडोर विकसित किया जाना चाहिए, जिससे आस्था के साथ-साथ रोजगार और आर्थिक विकास को भी बढ़ावा मिले। उन्होंने सुनौली-भैरहवा बॉर्डर क्षेत्र को इस दृष्टि से अत्यंत महत्वपूर्ण बताया।
क्षेत्र नंबर तीन को चुनने के सवाल पर उन्होंने कहा कि यह भूमि उनकी मातृभूमि है, जहां से उनका जीवन और संघर्ष शुरू हुआ। यह क्षेत्र शांति, पवित्रता और सांस्कृतिक चेतना का संदेश देता है। गोरखनाथ बाबा के मंदिर जैसे पवित्र स्थलों की निकटता इसे भारत-नेपाल के बीच एक आध्यात्मिक प्रवेश द्वार बनाती है।
अंत में गोपाल भंडारी ने कहा कि उनका लक्ष्य संसद में जाकर केवल प्रतिनिधित्व करना नहीं, बल्कि धर्म, राष्ट्र और सुशासन के लिए सशक्त आवाज बनना है।









