गाजीपुर के मंगरू मल्लाह ने नाव को ही बना लिया अपना आशियाना और इसे ही बनाया रोजी-रोटी का जरिया

गंगा किनारे 50 साल से रहते हैं मंगरू

सरकार द्वारा दी गई बुनियादी सुविधाओं से पूरी तरह वंचित है यह परिवार

उमेश चन्द्र त्रिपाठी

वाराणसी! गाजीपुर के ददरी घाट पर गंगा तट की एक अनूठी कहानी है मंगरू मल्लाह की। पिछले 50 वर्षों से उन्होंने अपनी नाव को ही अपना आशियाना बना लिया है। यह नाव न केवल उनका आशियाना है, बल्कि आजीविका का साधन भी है।

 

 

मंगरू की पूरी दिनचर्या इसी नाव पर बीतती है। वे यहीं खाना खाते हैं, कपड़े सुखाते हैं और गंगा में स्नान कर अपना दिन शुरू करते हैं। उनके परिवार में पत्नी और दो बेटे हैं। बड़ा बेटा विवाहित है और पिता की तरह नाव चलाता है। छोटा बेटा मिठाई की दुकान पर काम करता है। पत्नी घर का काम संभालती हैं।

 

नाव ही परिवार की आय का मुख्य स्रोत है, जिसे मंगरू ने खुद के पैसों से खरीदा था। सीजन में नाव से अच्छी कमाई हो जाती है। लेकिन जब यात्री कम होते हैं, तब वे नाव को किनारे लगाकर पूजा सामग्री बेचते हैं।

मंगरू की स्थिति सरकारी योजनाओं की पहुंच पर सवाल खड़े करती है। उनके पास राशन कार्ड है, लेकिन पिछले कई महीनों से राशन नहीं मिल रहा है। सरकार की कल्याणकारी योजनाओं का लाभ भी उन तक नहीं पहुंच पाया है। आधी सदी से गंगा की लहरों के बीच जीवन बिताने वाले इस निषाद अब तक पूरी तरह से बुनियादी सुविधाओं से वंचित है।

 

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