*महान क्रांतिकारी, स्वतंत्रता संग्राम सेनानी और महराजगंज जनपद में शिक्षा क्रांति के अग्रदूत प्रोफेसर शिब्बन लाल सक्सेना को उनके जन्मदिन पर याद करना भी भूल गए लोग!* 

उमेश चन्द्र त्रिपाठी

महराजगंज! प्रोफेसर शिब्बन लाल सक्सेना का जन्म 13 जुलाई 1906 को बरेली के एक मध्यम वर्गीय कायस्थ परिवार में हुआ था में हुआ था। उन्होंने अपनी प्रारंभिक और माध्यमिक शिक्षा कानपुर में प्राप्त की, और इलाहाबाद विश्वविद्यालय से दर्शन शास्त्र में प्रथम श्रेणी में एम ए करने के साथ आगरा विश्वविद्यालय से गणित विषय में परास्नातक की उपाधि प्राप्त की। बाद में वे गोरखपुर के सेंटएंड्रयूज़ कॉलेज में गणित और दर्शनशास्त्र के प्रोफेसर नियुक्त हुए। महात्मा गांधी की शिक्षाओं ने उन्हें समाज के हाशिये पर पड़े वर्गों के सामाजिक-आर्थिक मुद्दों को उठाने के लिए प्रेरित किया । 

 

उन्होंने श्रमिक वर्ग के कल्याण में रुचि ली और स्वतंत्रता आंदोलन के दौरान और उसके बाद कई ट्रेड यूनियनों के सक्रिय सदस्य और अध्यक्ष रहे। प्रोफेसर सक्सेना को स्वतंत्रता आंदोलन में भाग लेने के लिए कई बार गिरफ्तार किया गया और कुल 13 साल जेल में बिताए। इसमें अगस्त 1942 के आंदोलन के दौरान ‘गोरखपुर षडयंत्र’ में शामिल होने के लिए 10 साल का कठोर कारावास भी शामिल है।

प्रोफेसर शिब्बन लाल सक्सेना जलियांवाला बाग त्रासदी के विरोध में कानपुर में हुई हड़ताल में शामिल थे। उन्होंने गांधीजी के कई सत्याग्रहों और किसान, मजदूर, हरिजन और छात्र आंदोलनों में भी भाग लिया।

 

प्रोफेसर सक्सेना कांग्रेस पार्टी के टिकट पर संयुक्त प्रांत से संविधान सभा के लिए चुने गए थे। सभा में, वे गोहत्या पर प्रतिबंध लगाने के प्रबल समर्थक थे। उन्होंने राष्ट्रपति से संबंधित प्रावधानों और मादक पेय पदार्थों व नशीले पदार्थों पर प्रतिबंध लगाने के मामले में भी हस्तक्षेप किया था।

सक्सेना एक अनुभवी सांसद थे और पहली, दूसरी और पांचवीं लोकसभा के लिए नियुक्त हुए थे। वे कई श्रमिक सम्मेलनों में भारतीय प्रतिनिधि रहे।

महराजगंज की ऐतिहासिक मिट्टी में जन्मी देशभक्ति की अमिट कहानी, प्रोफेसर शिब्बन लाल सक्सेना आज भुला दिए जा रहे हैं। स्वतंत्रता संग्राम से लेकर शिक्षा और जनसेवा तक में उनका योगदान अविस्मरणीय रहा, लेकिन उनके नाम पर सम्मान के आयोजन न के बराबर हैं। संविधान निर्मात्री सभा के सदस्य के रूप में भी प्रोफेसर सक्सेना जी ने महत्वपूर्ण योगदान दिया। संविधान के लगभग सभी अनुच्छेदों पर उन्होंने अपना संशोधन प्रस्ताव दिया। सन 1946 में संविधान निर्मात्री सभा के सदस्य बनाए जाने के बाद इस सभा में प्रोफेसर सक्सेना जी ने अप्रतिम सहयोग दिया। वे डॉक्टर भीमराव अंबेडकर के प्रशंसा पत्र भी रहे।

पूर्वांचल के गांधी के नाम से प्रसिद्ध महान क्रांतिकारी प्रोफेसर शिब्बन लाल सक्सेना की धरती के रूप में महराजगंज जनपद को जाना जाता है, लेकिन समय के साथ अब लोग उन्हें भूलते जा रहे हैं। 13 जुलाई को उनका जन्मदिन गुजरा, लेकिन जनपद में कहीं कोई खास आयोजन नहीं देखने को मिला, न ही शैक्षणिक संस्थानों या सार्वजनिक स्थलों पर उनकी तस्वीरें देखने को मिलती हैं।

बता दें कि प्रोफेसर शिब्बन लाल सक्सेना 1931 में महराजगंज आए और आजादी के आंदोलन में पूरी सक्रियता के साथ जुड़ गए। वे स्वतंत्रता सेनानी ही नहीं, बल्कि जनप्रतिनिधि भी रहे और संसद के सदस्य के रूप में देश के लिए कार्य किया।

महराजगंज जनपद को पहचान दिलाने में प्रोफेसर शिब्बन लाल सक्सेना का बड़ा योगदान रहा है। उन्होंने जिले को पहला इंटर कॉलेज, डिग्री कॉलेज और पीजी कॉलेज जैसे प्रमुख शिक्षण संस्थान दिए। किसानों, मजदूरों और गरीबों की आवाज बुलंद की और उन्हें सामाजिक-आर्थिक न्याय दिलाने के लिए संघर्ष किया।

बावजूद इसके, आज उनकी यादें धुंधली होती जा रही हैं। शहर के मुख्य चौराहे पर उनकी एकमात्र प्रतिमा जरूर लगी है, जिसे सक्सेना चौक कहा जाता है, लेकिन उससे आगे कोई ठोस प्रयास नहीं दिखते। न तो विद्यालयों में उनकी तस्वीरें हैं और न ही विद्यार्थियों को उनके योगदान से अवगत कराया जा रहा है।

इस पर जब कुछ स्थानीय लोगों से बात की गई तो उन्होंने चिंता व्यक्त की। उनका कहना था कि आज की पीढ़ी इतिहास से कटती जा रही है। आनन्दनगर स्थित लाल बहादुर शास्त्री पीजी कॉलेज के प्राचार्य डॉ राम पाण्डेय का कहना है कि महराजगंज जैसे बेहद पिछड़े जिले में शिक्षा की अलख जगाने में प्रोफेसर शिब्बन लाल सक्सेना का अहम योगदान रहा है। उन्होंने महाराजगंज जनपद का नाम न सिर्फ प्रदेश बल्कि पूरे भारत के फलक पर स्थापित किया।

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