नौतनवां स्थित माता बनैलिया मंदिर के 34 वें वार्षिकोत्सव पर 20 जनवरी को शोभा यात्रा की तैयारियां जोरों पर

 

उमेश चन्द्र त्रिपाठी

नौतनवां महराजगंज ! नगर में स्थित विख्यात मां बनैलिया मंदिर के 34 वें वार्षिकोत्सव पर 20 जनवरी को निकलने वाली शोभायात्रा की तैयारियां पूरे जोरों पर है। वार्षिकोत्सव को लेकर मंदिर परिसर में सजावट का कार्य शुरू हो गया है। मंदिर परिसर को काले, सुनहले, लाल और केसरिया पंडाल से बड़े ही खूबसूरती सेे और सद्भाव के रंग बिरंगी लाइटों से सुसज्जित किया जा रहा है।

हर वर्ष की तरह इस बार भी 20 जनवरी को वार्षिकोत्सव धूमधाम से मनाने के लिए स्थानीय श्रद्धालुओं का जत्था भी तैयारी को पूरा करवाने में जुट गया है। श्रद्धालु कार्यक्रम को सफल बनाने के लिए कोई कसर नहीं छोड़ना चाहते हैं। 20 जनवरी को सुबह 11 बजे शोभा यात्रा मंदिर परिसर से निकल कर पूरे नगर की परिक्रमा करते हुए पुनः मंदिर प्रस्थान करेगी। उसके बाद मंदिर परिसर में आरती और सार्वजनिक भंडारा प्रसाद के बाद 21 जनवरी को शाम 7 बजे से विशाल मां भगवती जागरण के साथ आकर्षक झांकियों की भी प्रस्तुति होगी।

वहीं माता बनैलिया के भव्य शोभायात्रा को ध्यान में रखते हुए नगर के चौक चौराहों पर भी श्रद्धालु भक्तगण फूलों बैनर से नगर को सजाने में लग गए है।

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मां बनैलिया मंदिर विकास समिति के अध्यक्ष दयाराम जायसवाल ने बताया कि थारू समाज की भूमि पर यहां पहले घना जंगल था, जिसको काटकर किसान केदारनाथ मिश्र खेती करते थे। एक दिन उनको सपने में मां ने कहा कि यहां पर मेरी पिंडी खोजकर मंदिर का निर्माण करो। इसके बाद केदार मिश्र ने सन 1888 में यहां पर एक छोटे से मंदिर का निर्माण कराया, जंगल होने के कारण उसका नाम वनदेवी के नाम से जाना जाता था। धीरे-धीरे मंदिर विकसित होने से बनैलिया मंदिर के नाम से प्रसिद्ध हो गया। जिसमें विधि-विधान से 20 जनवरी 1991 में मूर्ति की स्थापना की गई। प्रतिवर्ष इस दिन को वार्षिकोत्सव के रूप में बड़े ही धूमधाम के साथ मनाया जाता है।

मां बनैलिया देवी मंदिर का परिचय

पूर्वी उत्तर प्रदेश के नेपाल सीमा को जोड़ने वाले नगर नौतनवां में वन देवी अर्थात मां बनैलिया के नाम से विख्यात एक भव्य मंदिर स्थित है। मंदिर के इतिहास के सम्बंध में बताया जाता है कि अज्ञात वास के दौरान राजा विराट के भवन से लौटते समय पाण्डवों ने मां वन शक्ति की यहां पर अराधना किया था। जिससे प्रसन्न होकर मां ने पिंडी स्वरूप में पाण्डवों को दर्शन दिया। कालांतर में मां की पिण्डी खेतों के बीच समाहित हो गई। एक दिन खेत जोत रहे किसान केदार मिश्र को स्वप्न में मां ने कहा कि यहां पर मेरी पिंडी खोजकर मेरे मंदिर का निर्माण करो। इसके बाद केदार मिश्र ने सन 1888 में यहां पर एक छोटे से मंदिर का निर्माण कराया। जो आज विशालकाय मंदिर के रूप में स्थापित हो चुका है। जिसकी स्थापना 20 जनवरी 1991 को विधि पूर्वक हुई। प्रतिवर्ष इस दिन को वार्षिकोत्सव के रूप में बड़े ही धूमधाम के साथ मनाया जाता है। यहां पर आने वाले हर भक्त की इच्छा मां पूरा करती है। चूंकि मां को हाथी बहुत पसंद है, इसलिए इच्छा पूरी होने पर श्रद्धालु यहां पर हाथी की मूर्ति चढ़ाते हैं।

मंदिर का संरचना

मंदिर का निर्माण वृताकार अरघा नुमा संरचना है, जिसके अंदर मां के नौ स्वरूपों को स्थापित किया गया है। केन्द्र में मां बनैलिया की भव्य प्रतिमा शोभायमान है। मंदिर वर्गाकार होने के कारण मां का परिक्रमा मंदिर के अंदर ही जाती है। मां बनैलिया मंदिर परिसर में स्थापित हनुमान मंदिर,शिव मंदिर, शनिदेव मंदिर और भगवान परशुराम का भव्य मंदिर परिसर की भव्यता को और दर्शाता है।

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