रूपंदेही क्षेत्र नंबर तीन का उपचुनाव मधेशी दलों की अस्मिता का सवाल – हृदयेश त्रिपाठी राष्ट्रीय अध्यक्ष जनता प्रगतिशील पार्टी नेपाल

अपनी अस्मिता बचाने को मधेशी दलों में जद्दोजहद

उमेश चन्द्र त्रिपाठी

भैरहवा नेपाल! राजशाही समाप्त होने के बाद नेपाल की राजनीति में मधेशी दलों का दबदबा था। अब वे अपनी अस्मिता बचाने की जद्दोजहद में हैं। लोकतांत्रिक नेपाल में 2008 में पहली बार हुए चुनाव में नेपाली संसद में मधेशी दलों के सांसदों की संख्या 60-70 के करीब थी। आज घटकर मात्र 15-20 रह गई है।

 

इसका सबसे बड़ा कारण मधेशी दलों में बिखराव और करीब 70-80 लाख युवाओं, महिलाओं और युवतियों का भारत सहित अन्य देशों में रोजगार के सिलसिले में पलायन करना है। वेशक पलायन की यह पूरी की पूरी संख्या अकेले मधेश क्षेत्र की नहीं है लेकिन सर्वाधिक संख्या इसी क्षेत्र की है।

बिखरे हुए मधेशी दलों को अपनी गलती का शायद एहसास हुआ है और वे धीरे धीरे एक मंच पर आना शुरू कर दिए हैं। मौका है मधेश क्षेत्र में होने जा रहा रूपंदेही जिले के क्षेत्र नं तीन का उपचुनाव।

भारतीय सीमा से सटे रूपंदेही जिले का प्रतिनिधि सभा क्षेत्र नंबर तीन का उपचुनाव यूं तो नेपाल की राजनीति में कोई खास मायने नहीं रखता लेकिन यह उप चुनाव मधेशी दलों की अस्मिता का सवाल है। इस क्षेत्र से राजा समर्थक पार्टी राष्ट्रीय प्रजातंत्र पार्टी के दीपक बोहरा लगातार सांसद होते रहे हैं। दीपक बोहरा की छवि हिंदू वादी नेता की रही है। वे स्वर्गीय नरेश वीरेंद्र विक्रम शाह के काफी करीबी रहे हैं। बाद में पूर्व नरेश ज्ञानेंद्र के भी करीबी थे। पिछले दिनों उनका निधन हो गया। इस नाते क्षेत्र संख्या तीन में उपचुनाव होना है।

मौजूदा समय में नेपाल के मधेश राजनीति में एक नाम तेजी से उभर कर सामने आ रहा है हृदयेश त्रिपाठी का ! हृदयेश त्रिपाठी भारतीय सीमा से सटे नेपाली भू-भाग नवल परासी के निवासी हैं और यही उनका चुनाव क्षेत्र भी है जहां से वे कई बार सांसद और मंत्री रहे हैं। मौजूदा समय में वह जनता प्रगतिशील पार्टी के राष्ट्रीय अध्यक्ष हैं। इस पार्टी का मधेश के सभी जिलों में मजबूत संगठन है ही पहाड़ के जिलों तक भी इसका विस्तार हुआ है। जनता प्रगतिशील पार्टी मधेश क्षेत्र में तेजी से स्वीकार्य होता हुआ मधेश आधारित राजनीतिक दल है।

हृदयेश त्रिपाठी ने पहल कर करीब आधा दर्जन मधेश दलों को एक मंच पर ले आने में सफलता हासिल कर ली है। नाम दिया है लोकतांत्रिक मोर्चा ! इस मोर्चा के गठन के पीछे क्षेत्र संख्या तीन के उपचुनाव में सत्तारूढ़ एमाले सहित राजा वादी पार्टी राप्रपा को हराना अथवा कड़ी टक्कर देना है। स्वर्गीय दीपक बोहरा जिसके निधन के बाद यहां उपचुनाव होना है, वे इस क्षेत्र के बहुत ही लोकप्रिय नेता रहे हैं। काफी संभावना है कि राप्रपा इन्हीं के परिवार के किसी सदस्य को उम्मीदवार बनाए। यदि ऐसा हुआ तो लोकतांत्रिक मोर्चा के उम्मीदवार के चुनाव जीत पाने की संभावना दूर-दूर तक संभव नहीं है। हां यदि कड़ी टक्कर ही दे पाए तो यह मधेशी दलों के पुनर्जीवन का संकेत जरूर होगा।

भारतीय सीमा से सटे नेपाल के बड़े भूभाग को मधेश अथवा तराई के नाम से जाना जाता है। यहां की आबादी करीब 90 लाख है जो नेपाल के कुल आबादी दो करोड़ 80 लाख का बड़ा हिस्सा है। इस क्षेत्र में मेची से महाकाली तक कुल 24 जिले है।

बता दें कि नेपाल का भू-भाग दो भागों में बंटा हुआ है। एक मैदानी क्षेत्र दूसरा पहाड़ क्षेत्र। राजशाही के वक्त से ही नेपाल में राजनीति से लेकर सेना, पुलिस और सरकारी नौकरियों में पहाड़ियों का ही वर्चस्व है जो अभी भी कायम है। 2008 के चुनाव में मधेशियों की ताकत से पहाड़ी वर्चस्व दरकता हुआ दिखाई पड़ने से पहाड़ी लोग सकते में आ गए। फिर एक चाल चली गई कि मधेशी राजनीति कमजोर कैसे हो। इसके लिए संसदीय क्षेत्रों के परिसीमन की योजना बनाई गई जिसमें नेपाली कांग्रेस की महत्वपूर्ण भूमिका थी। इस परिसीमन के माध्यम से तराई के संसदीय सीटों को, जो पहले पूरब पश्चिम का था उसे उत्तर दक्षिण को कर दिया। ऐसा करके मधेश वोटरों को विभाजित कर दिया गया।

मधेश के ज्यादातर संसदीय सीट जो मधेश बाहुल्य थे वहां अब एक तिहाई मधेशी और दो तिहाई पहाड़ी वोटर हो गए। मधेशी दल इसका विरोध करते रह गए लेकिन नेपाली कांग्रेस सहित सभी पहाड़ी प्रभुत्व वाले दलों ने मधेशियों के विरोध पर ध्यान ही नहीं दिया। नेपाल के उत्तर तरफ पहाड़ शुरू हो जाता है और यहां पहाड़ियों की संख्या अधिक है।

इस तरह राजनीतिक रूप से मधेशियों को कमजोर करने का बड़ा कदम उठाया गया। संसदीय सीटों के इस परिसीमन का नतीजा यह रहा कि नेपाली संसद में मधेशियों की संख्या लगातार घटती गई।

यहां यह गौर करने की बात है कि पूर्व में मधेश की राजनीति में नेपाली कांग्रेस का दबदबा रहता था, मधेशी जनता नेपाली कांग्रेस को अपना हितैषी मानती रही लेकिन यह बहुत देर में समझ पाई कि आखिर नेपाली कांग्रेस ने अपना राष्ट्रीय अध्यक्ष किसी मधेशी नेता को क्यों नहीं बनाया जबकि मधेश में एक से एक कांग्रेस के बड़े नेता मौजूद हैं। नेपाल का नया संविधान भी नेपाली कांग्रेस की गठबंधन सरकार में लागू हुआ जिसमें मधेशी जनता के तमाम अधिकारों की अनदेखी की गई। हृदयेश त्रिपाठी के प्रयासों से गठित लोकतांत्रिक मोर्चा पूर्व में लागू संविधान में संशोधन की आवाज बुलंद कर उसमें मधेशियों के हक और अधिकार को समाहित करने की मांग तेज करेगा जिसमें संसदीय सीटों का परिसीमन निरस्त कर उसे पूर्ववत रखने की मांग प्रमुख है।

नागरिकता विसंगति भी बड़ा मासला

नागरिकता विसंगति भी बड़ा मसला है। संविधान में नागरिकता संबंधी अधिकार का नियम कुछ यूं है कि इससे लाखों की संख्या में विवाहित भारतीय महिलाएं नागरिकता से वंचित हैं। मधेश से जुड़े ऐसे ही कुछ मसले हैं जिनकी नेपाल के लोकतांत्रिक संविधान में अनदेखी की गई, लोकतांत्रिक मोर्चा की इसे लेकर पूरे मधेश में
आंदोलन चलाने की तैयारी है। लोकतांत्रिक मोर्चा में मुख्यतः उपेंद्र यादव, अशोक राई, बृजेश चंद लाल, रेशम चौधरी, सीके राउत की पार्टियां शामिल हैं। इन दलों का मधेश के अपने-अपने क्षेत्रों में खासा प्रभाव है। सभी मिलकर यदि मधेश की जीवंत समस्याओं के समाधान को लेकर लोगों को जागरूक कर पाए तो निसंदेह भारत सीमा से सटे नेपाल के लंबे चौड़े भू-भाग की राजनीति में ऐसा बदलाव होगा जिससे संपूर्ण नेपाल की राजनीति प्रभावित हुए बिना नहीं रहेगी। और ऐसा हुआ तो मधेशी दलें नेपाल की राजनीति में एक बार फिर अपना परचम लहराने में कामयाब होंगी।

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