मनोज कुमार त्रिपाठी
क्षेत्र नंबर 3 से निर्दलीय उम्मीदवार महेंद्र यादव ने चुनावी मैदान में दमदार एंट्री करते हुए अपनी दावेदारी को संघर्ष, समर्पण और जनसेवा की मजबूत विरासत से जोड़ा है। एक अनुभवी और जमीनी राजनीतिक चेहरे के रूप में उन्होंने स्पष्ट शब्दों में कहा—
> “मैं किसी पद से रिटायर होकर राजनीति में नहीं आया हूं। मेरा पूरा जीवन जनता की सेवा और उनके अधिकारों की लड़ाई को समर्पित रहा है।”
महेंद्र यादव ने यह भी संकेत दिया कि उनके लिए राजनीति सत्ता का साधन नहीं, बल्कि समाज परिवर्तन का संकल्प है। वर्षों से जनता के बीच सक्रिय रहकर उन्होंने हर मुद्दे पर आवाज उठाई है और अब उसी संघर्ष को जनादेश में बदलने के लिए मैदान में उतरे हैं।
पुराना चेहरा, निरंतर संघर्ष
उम्मीदवार महेंद्र यादव ने बताया कि वे कई बार चुनाव लड़ चुके हैं। जीत भले न मिली हो, लेकिन जनता के बीच उनकी मौजूदगी और जनहित के मुद्दों पर सक्रियता कभी कम नहीं हुई।
“हार-जीत से ऊपर उठकर मैंने जनता के अधिकार के लिए संघर्ष किया है,” उन्होंने दृढ़ स्वर में कहा।
मधेश आंदोलन में सक्रिय भूमिका
उन्होंने अपने राजनीतिक जीवन की सबसे बड़ी उपलब्धि के रूप में मधेश आंदोलन में अपनी सक्रिय भागीदारी का उल्लेख किया। उनके अनुसार, उनके नेतृत्व में क्षेत्र में आंदोलन हुआ और उससे कई अधिकार हासिल किए गए।
विशेष रूप से उन्होंने मुस्लिम समुदाय के अधिकारों का मुद्दा उठाते हुए कहा कि पहले नेपाल में अन्य समुदायों को दशहरा और दिवाली जैसे पर्वों पर छुट्टी मिलती थी, लेकिन मुस्लिम समुदाय को रमजान के दौरान वह सुविधा नहीं थी।
“हमने आंदोलन किया, आवाज उठाई और आज मुस्लिम समुदाय को भी नेपाल में समान नागरिक की तरह सुविधाएं मिल रही हैं। यह संघर्ष का परिणाम है,” उन्होंने कहा।
प्रलोभनों की राजनीति पर प्रहार
क्षेत्र में विभिन्न राजनीतिक दलों द्वारा मतदाताओं को लुभाने के प्रयासों पर उन्होंने तीखी प्रतिक्रिया दी।
“आज कई पार्टियां तरह-तरह के प्रलोभन देकर जनता का विश्वास जीतना चाहती हैं, लेकिन मेरा विश्वास है कि जनता अब जागरूक है। वे काम और संघर्ष को पहचानती है, न कि लालच को,” उन्होंने कहा।
“मुद्दा है अधिकार और सम्मान”
निर्दलीय उम्मीदवार ने साफ किया कि उनका चुनावी एजेंडा जनता के अधिकार, समानता और सम्मान पर केंद्रित है।
उन्होंने कहा कि वे क्षेत्र में विकास, सामाजिक न्याय और सभी समुदायों के लिए समान अवसर को लेकर मैदान में उतरे हैं।
> “मैं राजनीति को पेशा नहीं, बल्कि जनसेवा का माध्यम मानता हूं। जनता का विश्वास ही मेरी पूंजी है,” उन्होंने आत्मविश्वास के साथ कहा।
चुनावी माहौल में जहां बड़े दल संसाधनों और प्रचार के बल पर मैदान में हैं, वहीं यह निर्दलीय उम्मीदवार अपने लंबे संघर्ष, जमीनी पकड़ और जनआंदोलनों की विरासत को आधार बनाकर मुकाबले में उतर चुका है। अब देखना यह है कि क्या जनता उनके समर्पण और संघर्ष को जीत में बदलती है या नहीं।