“सृष्टि का उद्गम: माँ” — मिलिंद गुप्ता की संवेदनशील रचना ने छुआ पाठकों का हृदय

मनोज कुमार त्रिपाठी 

गोरखपुर ! गोरखपुर निवासी एवं आदरणीय श्री राजेश गुप्ता जी के सुपुत्र मिलिंद गुप्ता ने अपनी लेखनी के माध्यम से “सृष्टि का उद्गम: माँ” जैसी भावपूर्ण और अद्भुत रचना प्रस्तुत कर साहित्य जगत का ध्यान आकर्षित किया है।

उन्होंने माँ की ममता, त्याग और सृजन शक्ति को अत्यंत सुंदर, संवेदनशील और प्रभावशाली शब्दों में पिरोया है। उनकी अभिव्यक्ति की गहराई और भावों की पवित्रता इस बात का प्रमाण है कि युवा पीढ़ी में साहित्य के प्रति गहरी समझ और समर्पण विद्यमान है।

मिलिंद गुप्ता की यह रचना न केवल माँ के प्रति श्रद्धा और कृतज्ञता व्यक्त करती है, बल्कि पाठकों के हृदय को भी भाव-विभोर कर देती है।

By – Milind Gupta

माँ के भीतर ममता का, एक मीठा सागर बहता है,

जहाँ सिमटकर सो रहा, एक नन्हा ईश्वर रहता है।

वह नाभि-कमल की डोरी ही, जीवन का आधार बनी,

शून्य से जो देह गढ़े, वह माँ ही बस साकार बनी।

नमक वही जो सागर में, वही गर्भ के पानी में,

प्रकृति ने भी रूप धरा है, माँ की एक कहानी में।

जैसे शेषनाग की छाया, वैसे माँ का आँचल है,

कवच बना जो घेरे रखे, वह कोख का कोमल जल है।

अभिमन्यु सा ज्ञान वहीं से, अंतर्मन में आता है,

माँ की हर इक धड़कन को, वह बिना कहे सुन जाता है। ईश्वर का हर एक सपना, माँ के आँचल में पलता है, माँ की कोख से चलकर ही, दुनिया का रूप निखरता है। हर माँ के भीतर धड़कता, एक नया संसार है,

सृष्टि का यह महा-मिलन, अद्भुत और अपार है।

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