प्रयागराज के कुंभ मेले में छाए रूस के ‘गिरि महाराज’
सार
सात फीट लंबे और आकर्षक शारीरिक सौष्ठव वाले आत्म प्रेम गिरि की तस्वीरें सोशल मीडिया पर वायरल हो रही हैं। मूल रूप से रूस के रहने वाले गिरि महाराज ने 30 साल पहले हिंदू धर्म अपना लिया और अपना जीवन सनातन धर्म के प्रचार-प्रसार के लिए समर्पित कर दिया। वह एक शिक्षक थे लेकिन बाद में संन्यास ले लिया और जूना अखाड़ा से जुड़ गए।

रूस में थे शिक्षक, 30 वर्ष से सनातन धर्म की जगा रहे हैं अलख
जूना अखाड़ा से जुड़ नेपाल के काठमांडू स्थित आश्रम में कर रहे साधना
उमेश चन्द्र त्रिपाठी
काठमांडू प्रयागराज! महाकुंभ के इस आध्यात्मिक पर्व में पहुंचे नाना प्रकार के रूप-रंग व वेशभूषाधारी संन्यासियों के बीच एक नए बाबा का पदार्पण चर्चा में है। सात फीट लंबे,आकर्षक शारीरिक सौष्ठव वाले आत्म प्रेम गिरि के महाकुंभ आगमन को लेकर इंटरनेट मीडिया पर फोटो प्रसारित हो रही है।
महाराज मूल रूप से रूस के रहने वाले हैं।

मस्कुलर बाबा के नाम से पहचाने जाने वाले गिरि महाराज मूल रूप से रूस के रहने वाले हैं। वह करीब 30 वर्ष पूर्व हिंदू धर्म को अपनाते हुए अपना जीवन सनातन धर्म के प्रचार-प्रसार के लिए समर्पित कर दिया। एक शिक्षक के रूप में कार्य करने वाले मस्कुलर बाबा संन्यास धारण कर जूना अखाड़ा से जुड़े और नेपाल के काठमांडू में बने आश्रम में निवास कर साधना में लीन रहते हैं।
इंस्टाग्राम और अन्य सोशल प्लेटफार्म पर साझा हो रहीं तस्वीरें
गौर वर्ण, भगवा वस्त्र और रुद्राक्ष की माला धारण करने वाले आत्म प्रेम गिरी अपने प्रभावशाली व्यक्तित्व से मेले में आने वाले तीर्थयात्रियों और साधुओं के बीच अलग दिखाई देते हैं। इंटरनेट मीडिया पर उनकी तुलना भगवान परशुराम से की जा रही है। महाकुंभ मेला में मस्कुलर बाबा की तस्वीरें और वीडियो इंटरनेट मीडिया पर प्रसारित हो रही है। इंस्टाग्राम और अन्य मंचों पर उनकी तस्वीरें साझा की जा रही हैं।
संगम की रेती पर एकता, समता और समरसता का महाकुंभ- गिरि महराजगंज
तीर्थराज में संगम तट पर सनातन आस्था और संस्कृति के महापर्व महाकुंभ का आयोजन हो रहा है। प्रयागराज का महाकुंभ विश्व का सबसे बड़ा मानवीय और आध्यात्मिक सम्मेलन है। यूनेस्को ने महाकुंभ को मानवता की अमूर्त सांस्कृतिक विरासत घोषित किया है।
इस मानवता के महापर्व में देश के कोने-कोने से अलग-अलग भाषा, जाति, पंथ, संप्रदाय के लोग बिना किसी भेदभाव के एक साथ पवित्र त्रिवेणी में पुण्य डुबकी लगा रहे हैं। श्रद्धालु साधु-संन्यासियों का आशीर्वाद ले रहे हैं। मंदिरों में दर्शन कर अन्नक्षेत्र में एक ही पंगत में बैठ कर भंडारों में प्रसाद ग्रहण कर रहे हैं।
देश के सभी जाति, वर्ग, पंथ, संप्रदाय के
लोग आ रहे एकता, समता, समरसता का महाकुंभ सनातन संस्कृति के उद्धृत मूल्यों का सबसे बड़ा मंच है। महाकुंभ भारत की सांस्कृतिक विविधता में समाई हुई एकता और समता के मूल्यों का सबसे बड़ा प्रदर्शन स्थल है। इसे दुनिया भर से आए पर्यटक देख कर आश्चर्यचकित हुए बिना नहीं रह पाते। कैसे अलग-अलग भाषा-भाषी, रहन-सहन, रीति-रिवाज को मानने वाले एकता के सूत्र में बंधे संगम में स्नान करने चले आते हैं।
साधु-संतों के अखाड़े हों या तीर्थराज के मंदिर और घाट बिना रोक टोक श्रद्धालु दर्शन, पूजन कर रहे हैं। संगम क्षेत्र में चल रहे अनेकों अन्न भंडार सभी भक्तों, श्रद्धालुओं के लिए दिन रात खुले हैं। जहां सभी लोग एक साथ पंगत में बैठ कर प्रसाद और भोजन ग्रहण कर रहे हैं।
महाकुंभ में भारत की विविधता इस तरह समरस हो जाती है कि उनमें किसी तरह का भेद कर पाना संभव नहीं है। इसमें सनातन परंपरा को मनाने वाले शैव, शाक्त, वैष्णव, उदासीन, नाथ, कबीर पंथी, रैदासी से लेकर भारशिव, अघोरी, कपालिक सभी पंथ और संप्रदायों के साधु,संत एक साथ मिलकर अपने-अपने रीति-रिवाजों से पूजन-अर्चन और गंगा स्नान कर रहे हैं।
संगम तट पर लाखों की संख्या में कल्पवास करने आए श्रद्धालु देश के कोने-कोने से अलग-अलग जाति, वर्ग,भाषा को बोलने वाले हैं। यहां सभी साथ मिलकर महाकुंभ की परंपराओं का पालन कर रहे हैं। महाकुंभ में अमीर,गरीब, व्यापारी, अधिकारी सभी तरह के भेदभाव भुलाकर एक साथ एक भाव में संगम में डुबकी लगा रहे हैं। महाकुंभ और मां गंगा नर-नारी, किन्नर, शहरी, ग्रामीण, गुजराती, राजस्थानी, कश्मीरी, मलयाली किसी में भेद नहीं करतीं। अनादि काल से सनातन संस्कृति की समता, एकता की यह परंपरा प्रयागराज में संगम तट पर महाकुंभ में अनवरत चली आ रही है। सही मायनों में प्रयागराज महाकुंभ एकता, समता, समरसता के महाकुंभ का सबसे बड़ा उदाहरण है।