नेपाल के लुंबिनी जैसा विकास नहीं कर सका यूपी के सिद्धार्थ नगर जनपद में स्थित विश्व प्रसिद्ध बौद्ध स्थल पिपरहवा 

पीएम नरेन्द्र मोदी ने जाना पिपरहवा का महत्व 

सांसद जगदंबिका पाल से लोगों को काफी उम्मीदें 

उमेश चन्द्र त्रिपाठी 

सिद्धार्थनगर जिले का पिपरहवा विश्व प्रसिद्ध बौद्ध स्थल है। अस्तित्व में आने के बाद इस स्थल के विकास की ओर अपेक्षित ध्यान नहीं दिया गया लिहाजा यह नेपाल के लुंबिनी जैसा विकास नहीं कर सका।

बता दें कि पिपरहवा जिसे शुद्धोधन की राजधानी कपिलवस्तु के रूप में पहचाना गया, उसे गौतम बुद्ध की क्रीड़ा स्थली भी कहते हैं जबकि लुंबिनी गौतम बुद्ध की जन्मस्थली है।

आज पिपरहवा की चर्चा इसलिए है क्योंकि प्रधानमंत्री नरेन्द्र मोदी ने स्वयं इस स्थल के एतिहासिक महत्व पर प्रकाश डाला है। हाल ही में नई दिल्ली स्थित किला राय पिथौरा कल्चर कांप्लेक्स में द लाइट एंड लोटस रेलिक्स आफ द अवेकंड वन प्रदर्शनी के उद्घाटन के मौके पर उन्होंने कहा कि यहां जो बुद्ध अवशेष रखे गए हैं वह 1898 में पिपरहवा में मिले थे। इस अवशेष को अंग्रेज जमीदार अपने साथ ले गए थे। 2025 में हांगकांग में इसकी नीलामी होने जा रही थी जिसे केंद्र सरकार और गोदरेज ग्रुप के हस्तक्षेप से बचाया गया। इसके लिए कई कानूनी नोटिसें दी गई थी। लंबी कानूनी लड़ाई के बाद अभी कुछ महीने पहले इसे भारत लाया जा सका जिसका दर्शन आज सुलभ हो पा रहा है।

पिपरहवा (कपिलवस्तु) दुनिया के दो तिहाई बुद्धिस्ट देशों के आस्था का केंद्र भी है। यहां की पवित्र मिट्टी श्री लंका सहित कई बुद्धिस्ट देशों के राष्ट्राध्यक्ष न केवल अपने माथे पर लगाए, साथ भी ले गए। करीब 40 साल पूर्व जब सिद्धार्थनगर बस्ती जिले के उत्तरी हिस्से में स्थित नौगढ़ नाम का तहसील था, तब यहां बुद्धिस्टों का रेला लगा रहता था। प्रतिदिन यहां रेलवे स्टेशन पर विदेशी बुद्ध तीर्थ यात्रियों का एक बोगी मौजूद रहता था। वे पहले पिपरहवा बुद्ध स्तूप का दर्शन करते थे फिर यहीं से ककरहवा बार्डर से नेपाल में बुद्ध की जन्म स्थली लुंबिनी जाते थे। यह बीते दिनों की बात है। आज इस एतिहासिक स्थल का हाल यह है कि शायद ही कोई भूला भटका विदेशी बुद्धिस्ट यहां आता हो।

प्रधानमंत्री नरेन्द्र मोदी ने जिस पवित्र भाव से पिपरहवा का बखान किया, स्थानीय जनप्रतिनिधि इससे नावाकिफ है। भगवान बुद्ध यहां अपने जीवन के 29 साल बिताए। इस नाते इस स्थल को बुद्ध की क्रीड़ा स्थली भी कहा जाता है। काश! प्रधानमंत्री नरेन्द्र मोदी जी जिस पवित्र भाव से पिपरहवा को समझ पाए, यहां के जनप्रतिनिधि भी समझ पाए होते तो आज पिपरहवा भी नेपाल के लुंबिनी जैसा विकसित होकर भारतीय अर्थव्यवस्था में थोड़ा बहुत हिस्सेदारी जरूर निभा रहा होता।

 

 

पूर्वी यूपी के जिला सिद्धार्थनगर की शिनाख्त गौतम बुद्ध से है। उनका बचपन का नाम सिद्धार्थ था। तीन दशक पूर्व बस्ती जिले के उत्तर स्थित नौगढ़ तहसील को अलग कर सिद्धार्थ के नाम से सिद्धार्थनगर जिले का सृजन हुआ है। जिला मुख्यालय से बीस किलोमीटर उत्तर की ओर स्थित पिपरहवा नामक स्थान को गौतम बुद्ध के पिता राजा शुद्धोधन की राजधानी के रूप में चिह्नित किया गया। यहां के स्तूप और अवशेष प्राचीन कालीन इस राजमहल के खंडहर जैसे आज भी विद्यमान है।

यहां से 16 किमी आगे उत्तर तरफ नेपाल में लुंबिनी स्थित है। लुंबिनी की शिनाख्त गौतमबुद्ध के जन्म स्थली के रूप में है। सिद्धार्थनगर के गौतम बुद्ध के स्थली के रूप में चिह्नित होने के बाद यहां अपेक्षित विकास नहीं हो पाया। 

पिपरहवा के खंडहरनुमा स्तूप को संरक्षित कर इसी के समीप सौ एकड़ भूमि का अधिग्रहण कर कपिलवस्तु के विकास की तमाम योजनाएं बनीं जरूर लेकिन राजनीतिक कारणों से यह मूर्त रूप नहीं ले पाई। 1980 में कांग्रेस शासन में केंद्र सरकार ने कपिलवस्तु विकास महायोजना तैयार की थी जिसके तहत जमीनें अधिकृत कर विकास की ढेर सारी योजनाएं बनीं थी। इसके लिए प्रारंभिक बजट में 80 लाख रुपए भी जारी किए गए थे। लेकिन स्थानीय जनप्रतिनिधियों ने इसमें रुचि ही नहीं दिखाई लिहाजा यह योजना फाइलों में दफन होकर रह गई।

आगे चलकर प्रदेश के विभिन्न सरकारों में यहां जरूर कुछ न कुछ निर्माण कार्य हुए लेकिन वे इस लायक नहीं हैं कि बुद्धिस्टों और टूरिस्टों को आकर्षित कर सके।

मायावती ने अपने शासनकाल में यहां हवाई पट्टी तक बनाने की घोषणा की थी। स्थानीय स्तर पर यदि इसके विकास के बारे में किसी ने सोचा तो वह स्वर्गीय धनराज यादव थे जो भाजपा के कई बार के विधायक और मंत्री रहे हैं। अखिलेश यादव ने अपनी सरकार में यहां सिद्धार्थ विश्वविद्यालय के रूप में बड़ी सौगात दी। इस विश्वविद्यालय की स्थापना से यहां जरूर चहल पहल बढ़ गई है।

प्रधानमंत्री नरेन्द्र मोदी के पिपरहवा के महत्व को समझने के बाद लोगों को उम्मीद है कि यदि स्थानीय जनप्रतिनिधि जरा भी ध्यान दें तो पिपरहवा का विकास लुंबिनी सरीखे हो सकता है जहां बुद्ध अनुयायी वाले देश भी अपना योगदान देने में रुचि लें। इसके लिए लोगों को स्थानीय सांसद जगदंबिका पाल से काफी उम्मीदें हैं। बुद्ध के अवशेष को हांगकांग से वापस भारत आने के बाद उन्होंने उसे पिपरहवा में वापस लाने की बात कही है।

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